अक्षय ऊर्जा


 

संक्षिप्त विवरण

भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने संबंधी लक्ष्य को हासिल करने में अक्षय ऊर्जा क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। उम्मीद की जा रही है कि वर्ष 2040 तक कुल बिजली उत्पादन का लगभग 49 प्रतिशत उत्पादन अक्षय ऊर्जा से किया जा रहा होगा। विद्युत भंडारण के लिए कम ऊर्जा खपत वाली बैटरियों का उपयोग किया जाएगा, इससे सौर ऊर्जा लागत वर्तमान की तुलना में 66 प्रतिशत तक कम हो जाएगी। कोयले के स्थान पर अक्षय ऊर्जा के उपयोग से भारत को सालाना 54,000 करोड़ रुपए (8.43 अरब यूएस डॉलर) की बचत होगी।

भारत में आने वाले वर्षों में बिजली की खपत बढ़ने की उम्मीद है। बढ़ती अर्थव्यवस्था, जनसांख्यिकीय विस्तार, शहरीकरण, आधुनिक ईंधन के इस्तेमाल में तेजी आना और एप्लायंस स्वामित्व में वृद्धि (2040 तक अतिरिक्त 315 मिलियन लोगों के देश के शहरों में रहने की उम्मीद है) के चलते बिजली की खपत में वृद्धि अपेक्षित है। भारत में प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत वैश्विक औसत का केवल एक-तिहाई है, जिसमें 240 मिलियन लोगों तक बिजली की पहुंच नहीं है। इन कारकों के चलते अक्षय ऊर्जा उत्पादन और उपयोग अत्यंत महत्वपूर्ण है।

कुल वैश्विक बिजली उत्पादन में भारत का लगभग 4 प्रतिशत हिस्सा है और वैश्विक अक्षय उत्पादन क्षमता में देश का योगदान 4.4 प्रतिशत है। चीन, अमेरिका और जर्मनी के बाद भारत और दुनिया का चौथा सबसे बड़ा पवन ऊर्जा क्षमता वाला देश है और सौर ऊर्जा क्षमता के मामले में भारत का छठा स्थान है। दुनिया की सबसे बड़ी भूमि आधारित सौर ऊर्जा और दुनिया का सबसे बड़ा रूफटॉप सौर संयंत्र दोनों भारत में ही स्थित हैं। नवंबर 2017 तक देश में 142,000 सौर पंप स्थापित किए गए, जिनमें से 131,000 बीते साढ़े वर्षों में ही इंस्टॉल किए गए हैं। भारत में वाणिज्यिक्षम अक्षय ऊर्जा स्रोतों में लगभग 1096 गीगावाट की क्षमता है। इसमें पवन ऊर्जा - 302 गीगावाट (100 मीटर की ऊंचाई पर); लघु पनबिजली - 21 गीगावाट; जैव-ऊर्जा - 25 गीगावाट; और 3 प्रतिशत बंजर भूमि के सिहाब से 750 गीवावाट सौर ऊर्जा क्षमताएं हैं।

भारत दुनिया में तेल का चौथा सबसे बड़ा और पेट्रोलियम उत्पादों तथा लिक्विफाइड प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का 15वां सबसे बड़ा आयातक है। स्वदेशी अक्षय ऊर्जा संसाधनों के बढ़ते उपयोग से महंगे आयातित जीवाश्म ईंधन पर भारत की निर्भरता कम होने की उम्मीद है। आर्थिक विकास, बढ़ती समृद्धि, शहरीकरण की बढ़ती दर और प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत बढ़ने जैसे कुछ कारण हैं, जिनसे देश में ऊर्जा की मांग में वृद्धि हुई है।

राष्ट्रीय सौर मिशन के लक्ष्य को 2022 तक ग्रिड से जुड़ी 20 गीगावाट सौर ऊर्जा क्षमता को बढ़ाकर 100 गीगावाट कर दिया गया है। इससे भारत के अक्षय ऊर्जा क्षेत्र में निवेश करने के इच्छुक निवेशकों के लिए सकारात्मक माहौल बनता है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) की रिपोर्ट ‘अक्षय ऊर्जा निवेश 2016 में वैश्विक रुझान’ में अक्षय ऊर्जा में निवेश करने वाले देशों की सूची में भारत को शीर्ष 10 देशों में रखा गया है। सरकार ने 2022 तक अतिरिक्त 175 गीगावाट की प्रस्तावित अक्षय ऊर्जा क्षमता वृद्धि को हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। इसमें से 100 गीगावाट अकेले सौर ऊर्जा से हासिल करने का लक्ष्य है। 16,500 करोड़ रुपए (2.55 अरब यूएस डॉलर) के निवेश से विश्व का सबसे बड़ा सौर पार्क मार्च 2018 में कर्नाटक में शुरू किया गया है।

फरवरी 2018 तक देश में कुल अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता 107.81 गीगावाट थी, जो 334.15 गीगावाट की कुल स्थापित क्षमता का 32.26 प्रतिशत है। 363 गीगावाट की संभावित क्षमता और अक्षय ऊर्जा क्षेत्र पर केंद्रित नीतियों के साथ देश में उत्तर भारत के अक्षय ऊर्जा केंद्र के रूप में उभरने की उम्मीद है। 2017-18 में पवन ऊर्जा क्षमता 34 गीगावाट रही और सौर ऊर्जा क्षमता 22 गीगावाट तक बढ़ी। नवंबर 2017 तक जैव ईंधन ऊर्जा क्षमता 8.1 गीगावाट रही, जिसमें जैव द्रव्य दहन, जैव द्रव्य गैसीकरण और खोई सह-उत्पादन क्षमताएँ शामिल हैं।

सरकार ने 2022 के अंत तक अक्षय ऊर्जा क्षमता के अपने लक्ष्य को संशोधित कर 175 गीगावाट कर दिया है, जो दुनिया में सबसे बड़ा विस्तार है और निवेशकों के लिए बड़े अवसर प्रदान कर रहा है। लक्ष्य क्षमता निम्नानुसार है:

भारत का अक्षय ऊर्जा लक्ष्य (गीगावाट में)

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार, दिसंबर 2016 तक भारत की स्थापित सौर सेल विनिर्माण क्षमता 2,953 मेगावाट थी और उसमें से लगभग आधे सौर उपकरणों का निर्यात किया जाता है। भारत 10 गीगावाट की पवन टर्बाइन विनिर्माण क्षमता के साथ अंतरराष्ट्रीय टर्बाइन बाजार में एक प्रमुख निर्यातक है।

अक्षय ऊर्जा उत्पादन और वितरण परियोजनाओं में ऑटोमैटिक रूट के अंतर्गत 100 प्रतिशत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) की अनुमति है, जो विद्युत अधिनियम, 2003 के प्रावधानों के अधीन है।

औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग के अनुसार, गैर परंपरागत ऊर्जा क्षेत्र में अप्रैल 2000 से मार्च 2018 के दौरान 6.39 अरब यूएस डॉलर की कुल एफडीआई इक्विटी मिली। भारत में वित्तीय वर्ष 2017 में सौर ऊर्जा क्षेत्र में 10 अरब यूएस डॉलर से ज्यादा का निवेश किया गया।


 

कुछ सरकारी प्रोत्साहन

भारतीय अक्षय ऊर्जा क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार द्वारा कुछ पहलें की गई हैं, जो निम्नलिखित हैं:

  • देश में जलविद्युत परियोजनाओं के विकास के लिए नई जलविद्युत नीति 2018-28 तैयार की गई है।
  • भारत सरकार ने क्लीनर कोयले के उपयोग के लिए उन्नत अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल प्रौद्योगिकियों पर 238 मिलियन यूएस डॉलर के राष्ट्रीय मिशन को लागू करने की योजना की घोषणा की है।
  • नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने सोलर रूफटॉप क्षेत्र को सीमा शुल्क और उत्पाद शुल्क का लाभ देने का निर्णय लिया है, जिससे इनकी स्थापना के साथ-साथ बिजली उत्पादन की लागत भी कम की जा सकेगी और विकास में वृद्धि होगी।
  • 2016-17 के अंत तक राष्ट्रीय बायोगैस और खाद प्रबंधन कार्यक्रम (एनबीएमएमपी) के तहत देश में लगभग 4.96 मिलियन घरेलू बायोगैस संयंत्र स्थापित किए गए।
  • भारतीय रेलवे निरंतर बिजली की खपत को कम करने वाले उपाय कर रहा है और स्वच्छ ऊर्जा के अधिकतम इस्तेमाल से उत्सर्जन स्तर को 2030 तक 33 प्रतिशत तक कम करने के लिए प्रयासरत है।
  • भारतीय विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र में ऑफशोर पवन ऊर्जा के विकास के लिए ऑफशोर पवन ऊर्जा नीति का मसौदा तैयार किया गया है।
  • उद्योग भागीदारी सहित अक्षय ऊर्जा के विभिन्न पहलुओं पर शोध और विकास को सहयोग प्रदान करना।