इन्कोटर्म्स

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1. इन्कोटर्म्स क्या हैं और ये व्यापार के लिए कैसे उपयोगी हैं?

इन्कोटर्म्स यानी अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक शर्तें। संक्षिप्त में इन्हें इन्कोटर्म्स कहा जाता है। दरअसल, ये अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए व्यापक रूप से स्वीकृत कुछ नियम होते हैं। ये नियम माल की डिलीवरी में शामिल दायित्व, लागत और जोखिमों के निर्धारण में मददगार होते हैं। डिलीवरी की शर्तों को इन्कोटर्म्स के माध्यम से कुशलतापूर्वक मानकीकृत किया जाता है और अंतरराष्ट्रीय बिक्री करारों (कॉन्ट्रैक्ट) में इनका उपयोग करने से पार्टियां भी निश्चिन्त हो जाती हैं।

ये शर्तें 1923 में अंतरराष्ट्रीय चैंबर ऑफ कॉमर्स ने विकसित और प्रकाशित की थीं। अब तक इनमें कई संशोधन हो चुके हैं। नवीनतम और वर्तमान संस्करण इन्कोटर्म्स 2010 है। हमेशा बदलते रहने वाले वैश्विक व्यापार परिदृश्य के साथ तालमेल बनाए रखने के लिए व्यापार शर्तों में नवीनतम अपडेट का काम जारी है और 2020 में नई व्यापार शर्तें आने वाली हैं।

2010 के संस्करण में ग्यारह नियम या परिभाषाएं हैं, जिनमें से सात (पूर्व-डब्ल्यू, एफसीए, सीपीटी, सीआईपी, डीएटी, डीएपी और डीडीपी) परिवहन के सभी साधनों पर लागू होते हैं और शेष चार (एफएएस, एफओबी, सीएफटी और सीआईएफ) समुद्री और अंतरदेशीय जलमार्ग परिवहन पर लागू होते हैं। ये शर्तें अंतरराष्ट्रीय बिक्री और डिलीवरी के संबंध में 'कौन, क्या और कब' जैसे पहलुओं का निर्धारण करने में मदद करती हैं, जैसे:

  • विक्रेता और खरीदार के दायित्व क्या हैं
  • विक्रेता द्वारा कितनी लागत वहन की जाएगी और खरीदार द्वारा कितनी
  • संपत्ति विक्रेता से कब और कैसे खरीदार को हस्तांतरित होती है
  • सामान के विक्रेता से खरीदार तक पहुंचने में कौनसे जोखिम शामिल होते हैं

इस प्रकार इन्कोटर्म्स में उल्लिखित शर्तें, अंतरराष्ट्रीय करारों (कॉन्ट्रैक्ट) में इस्तेमाल होने वाली शर्तों को मानकीकृत और परिभाषित करती हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार में गलतफहमियों को रोकने में मदद मिलती है। इन्कोटर्म्स दायित्वों, लागत और जोखिमों को बिना किसी संदेह के निर्धारित करने में मददगार होती हैं। इससे करार करने वाली पार्टियां भी निश्चित रहती हैं कि उन्हें अपने दायित्वों और लागत का निर्वहन किस-किस अनुपात में करना है।

इन्कोटर्म्स में भुगतान दायित्व, पोत की आवश्यकताएं, करार की समाप्ति, दिवालियापन आदि के विवरण शामिल नहीं होते हैं। यानी ये बिक्री का संपूर्ण करार नहीं होती हैं। फिर भी इन्हें अधिकांश अंतरराष्ट्रीय करारों में स्पष्ट उल्लेख के साथ शामिल किया जाता है। अधिकांश घरेलू करारों में भी समान प्रकार की (उदाहरण के लिए फ्रॉ ऑन रोड) शर्तों का उपयोग किया जाता है।

इन्कोटर्म्स के माध्यम से माल के अंतरराष्ट्रीय बिक्री करार का मसौदा तैयार करना आसान हो जाता है। इसलिए, व्यापारिक कंपनियां, विशेष रूप से निर्यातक और आयातक कंपनियां अनिवार्य रूप से इनका इस्तेमाल करती हैं। इन्कोटर्म्स का उपयोग सेवाओं की खरीद-बिक्री के लिए नहीं किया जाता है। फिर भी, समुद्री परिवहन और मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्ट बिजनेस, लॉजिस्टिक फर्म / कंपनियां, साख पत्रों में डील करने वाले बैंक और यहां तक कि व्यापार करने वाली कंपनियों / फर्मों को वित्त प्रदान करने वाले वित्तीय सेवा प्रदाता भी इन्कोटर्म्स का उपयोग करते हैं। वे खरीदारों और विक्रेताओं के दायित्वों को निर्दिष्ट करने के लिए इन शर्तों को शामिल करते हैं।

नवीनतम इन्कोटर्म्स 2010 में अंतरराष्ट्रीय व्यापार में विभिन्न नए घटनाक्रमों को शामिल किया गया है। जैसे- कार्गो सुरक्षा पर बढ़ती चिंताएं, मानक बीमा खंडों में परिवर्तन, इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड या दस्तावेजों का बढ़ता उपयोग, कार्गो से संबंधित जानकारी का आदान-प्रदान करने के दायित्व, लॉजिस्टिक्स व्यापार में नए घटनाक्रम, नए कंटेनराइजेशन और पॉइंट टू पॉइंट ट्रेड, ट्रेडिंग ब्लॉक के भीतर माल की आवाजाही, पारगमन में बिक्री और सीमा शुल्क मुक्त क्षेत्रों में फैलाव।

इसलिए, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में संलग्न सभी पार्टियों को इन्कोटर्म्स को जानना चाहिए और उन्हें अपने करारों में शामिल करना चाहिए।

2. एक्स वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट क्या होता है और इसमें किसकी क्या जिम्मेदारी होती है?

एक्स वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट - यह विक्रेता और क्रेता के बीच माल की डिलीवरी से पहले किया गया एक कॉन्ट्रैक्ट होता है। इसमें विक्रेता की जिम्मेदारी इतनी ही होती है कि वह निर्धारित समयावधि में या तय तारीख को निर्धारित स्थान पर खरीदार को माल सौंप दे और माल उठाने के लिए उसे सूचित कर दे। इसमें माल के परिवहन और जोखिम संबंधी सारी लागत खरीदार को वहन करनी होती है।

इसमें ध्यान देने वाली बात यह है कि एक्स-वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट का यह मतलब नहीं है कि विक्रेता द्वारा माल खरीदार की फैक्ट्री तक ही डिलीवर किया जाएगा। इसमें खरीदार कॉन्ट्रैक्ट में निर्धारित स्थान से माल ले सकता है, जो विक्रेता का परिसर, कार्यस्थल, फैक्ट्री या गोदाम कुछ भी हो सकता है। बशर्ते कि वह निर्यात किए जाने वाले देश के भीतर हो।

इसमें माल को गाड़ी में लोड कराने या निर्यात के लिए कस्टम्स से मंजूरी लेने आदि की जिम्मेदारी विक्रेता की नहीं होती है। यदि खरीदार खुद विक्रेता से माल को लोड कराने के लिए कहता है तो विक्रेता खरीदार के खर्च और खरीदार के ही जोखिम पर माल लोड करा सकता है। लेकिन यह विक्रेता की बाध्यता नहीं है। वह खरीदार को इसके लिए मना भी कर सकता है।

इसके अंतर्गत विक्रेता को माल से संबंधित कमर्शल इन्वॉइस और खरीदार द्वारा किए गए अनुरोध के मुताबिक कस्टम्स आदि से मंजूरी या कार्गो सुरक्षा या माल के परिवहन के लिए अन्य आधिकारिक अधिकार पत्र जैसे सभी जरूरी दस्तावेज खरीदार को सौंपना अनिवार्य है।

विक्रेता को माल के परिवहन के लिए अपने निर्धारित डिलीवरी स्थल से आगे का बीमा कराने की जरूरत नहीं होती है। हालांकि उसे खरीदार को यह बता देना चाहिए, ताकि आगे के परिवहन के लिए बीमा वह खुद करा सके।

विक्रेता को पूर्व में सहमत अनुसार समुचित ढंग से माल की पैकेजिंग करानी होती है और उन पर अच्छे तरीके से नाम लिखवाना होता है। डिलीवरी से पहले गुणवत्ता परीक्षण, नपाई-तुलाई या गिनती संबंधी सभी खर्च विक्रेता द्वारा ही वहन किए जाते हैं।

यदि खरीदार द्वारा किसी भी प्रकार की सहायता प्रदान करने या दस्तावेज हासिल करने में किसी प्रकार का खर्च किया जाता है तो विक्रेता को इसकी प्रतिपूर्ति करनी होती है, जब तक कि कॉन्ट्रैक्ट में अलग से उल्लेख न किया जाए कि इस प्रकार के खर्च कॉन्ट्रैक्ट की लागत में ही शामिल हैं।

इसमें विक्रेता द्वारा सूचित किए जाने के बाद निर्धारित समयावधि में माल को निर्धारित स्थान से उठवाने की प्राथमिक बाध्यता खरीदार की ही रहती है। इसी समय खरीदार को सहमत अनुसार, माल की डिलीवरी का भुगतान करना होता है। साथ ही, सहमत अनुसार डिलीवरी का प्रमाण देना भी आवश्यक होता है।

एक बार माल की डिलीवरी हो जाने के बाद हर लागत और जोखिम खरीदार का हो जाता है। डिलीवरी लेने में देरी के चलते बीमा, स्टोरेज जैसी किसी भी तरह की अतिरिक्त लागत का वहन खरीदार को स्वयं करना होता है। माल की डिलीवरी पर परिवहन और बीमा संबंधी खर्च भी खरीदार द्वारा ही वहन किए जाते हैं। डिलीवरी के बाद प्री-शिपमेंट निरीक्षण, सभी ड्यूटी और कर तथा कस्टम्स से मंजूरी संबंधी हर तरह के खर्च खरीदार द्वारा ही वहन किए जाते हैं।

सामान्यतया, एक्स-वर्क्स कॉन्ट्रैक्ट उस स्थिति में किए जाते हैं, जब खरीदार के पास उसका अपना लॉजिस्टिक्स सेवा प्रदाता हो (सामान्यतया मल्टीमॉडल ट्रांसपोर्ट ऑपरेटर), जो निर्धारित स्थान से खरीदार की तरफ से माल उठा सके, अंतर्देशीय परिवहन की व्यवस्था कर सके, निर्यात किए जा रहे देश में कस्टम्स से मंजूरी दिला सके और वहां से माल को सीमा-पार भिजवा सके।

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