एफएक्यू

सरकार द्वारा आयात तथा निर्यात का नियंत्रण क्‍यों तथा कैसे किया जाता है?

सरकार सामान्‍यतया निम्‍नलिखित कारणों से आयात तथा निर्यात पर प्रतिबंध लगाती है :

  • लोक मनोबल का संरक्षण,
  • मानव, पशु या वनस्‍पति के जीवन या स्‍वास्‍थ्‍य का संरक्षण,
  • पेटेंट, ट्रेडमार्क तथा कॉपीराइट का संरक्षण और भ्रामक पद्धतियों का निवारण;
  • कारावास श्रम के प्रयोग का निवारण;
  • कलात्‍मक, ऐतिहासिक या पुरातत्‍वीय मूल्‍य की राष्‍ट्रीय निधियों का संरक्षण;
  • प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण;
  • विखंडनीय सामग्री या उसके स्रोतों के व्‍यापार का संरक्षण;
  • युद्ध शस्‍त्रों, गोला-बारूदों तथा हथियारों के व्‍यापार का निवारण।

तथापि, कीमतों में स्‍थिरता रखने, अंतरराष्ट्रीय वचनबद्धताओं को पूरा करने तथा देशी उत्‍पादकों के हितों का संरक्षण करने आदि जैसी कुछ स्‍थितियों में भी सामान्‍यत: अस्‍थायी अवधि के लिए प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।

विदेश व्‍यापार (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1992 केन्‍द्र सरकार को विदेश व्‍यापार नीति अधिसूचित करने का अधिकार प्रदान करता है। तदनुसार, वाणिज्‍य मंत्रालय ने 2015-20 की अवधि के लिए विदेश व्‍यापार नीति अधिसूचित की है। इसके अलावा, सीमा-शुल्‍क अधिनियम, 1962 के अंतर्गत भी आयात तथा निर्यात पर कुछ प्रतिबंध लगाये गए हैं।

अधिकांश मदें किसी लाइसेंस / प्राधिकरण के बिना निर्यात या आयात की जा सकती हैं, लेकिन कुछ मदों के लाइसेंस / प्राधिवार के बिना निर्यात या आयात की अनुमति कतिपय निर्धारित शर्तों के पूरा करने पर ही दी जाती है। कुछ मदों का आयात या निर्यात निषिद्ध है। कुछ मदें सामान्‍यत: सिर्फ सरकारी उद्यमों द्वारा ही आयात या निर्यात की जा सकती हैं और कुछ मदों के आयात या निर्यात की अनुमति सिर्फ लाइसेंस / प्राधिवार पर ही दी जाती है। सभी प्रकार के माल के लिए आयात / निर्यात नीतियां आयात तथा निर्यात के लिए भारतीय व्‍यापार वर्गीकरण प्रणाली में हरेक मद के सामने सूचित की गई हैं, जिन्‍हें सामान्‍यत: आईटीसी (एचएस) के रूप में जाना जाता है। आईटीसी (एचएस) की अनुसूची–1 में आयात नीति व्‍यवस्‍था दी गई है, जबकि आईटीसी (एचएस) की अनुसूची-2 में निर्यात नीति व्‍यवस्‍था की जानकारी दी गई है।

इसके अलावा, देशी रूप से उत्‍पादित माल के लिए लागू देशी कानून / नियम / आदेश / विनियम / तकनीकी विनिर्देशन / पर्यावरण / सुरक्षा तथा स्‍वास्‍थ्‍य मानदंड भी आयात के लिए यथोचित परिवर्तनों के साथ लागू होते हैं, जब तक उन्‍हें अन्‍यथा विशिष्‍ट रूप से छूट प्राप्‍त न हो। इसके अलावा, अन्‍य मंत्रालयों / प्राधिकारियों द्वारा भी उत्‍पाद विशिष्‍ट प्रतिबंध या शर्तें लगायी जा सकती हैं। उदाहरण के तौर पर स्‍वास्‍थ्‍य, पर्यावरण या कृषि से संबंधित कार्य देखने वाले मंत्रालय स्‍वयं भी प्रतिबंध लगा सकते हैं।

सीमा-शुल्‍क अधिनियम, 1962 के अंतर्गत अधिकांश मदों पर आयात शुल्‍क लगाया जाता है। कुछ मदों पर निर्यात शुल्‍क भी लगाया जाता है। इनके विवरण सीमा-शुल्‍क टैरिफ अधिनियम, 1975 की अनुसूची–1 तथा 2 में दिए गए हैं। इस अधिनियम के अंतर्गत, डम्‍पिंग-रोधी सुरक्षा तथा एंटी-सब्‍सिडी प्रतिकारी शुल्‍क भी कुछ मदों पर लगाये गए हैं। विभिन्‍न कानूनों के अंतर्गत कुछ मदों पर उत्‍पाद विशिष्‍ट शुल्‍क भी लगाये जाते हैं।

आयात तथा निर्यात पर लगाये गए प्रतिबंध सामान्‍यत: सीमा-शुल्‍क विभाग द्वारा सीमाओं पर प्रवर्तित किए जाते हैं जो पोर्टों, हवाई-अड्डों, स्‍थल सीमा-शुल्‍क केन्‍द्रों तथा विदेशी डाकघरों में प्रवेश तथा निकास बिन्‍दुओं का प्रबंध करते हैं जिनके माध्‍यम से माल देश के भीतर पहुंचता है या देश से बाहर जाता है। सीमा-शुल्‍क अधिकारी न केवल शुल्‍क वसूल करते हैं, बल्‍कि कार्गो, बैगिज, डाक वस्‍तुओं के आयात तथा निर्यात और पोतों, विमानों आदि के आगमनम एवं प्रस्‍थान को नियंत्रित करने वाले विभिन्‍न प्रावधानों को भी प्रवर्तित करते हैं। उनके कार्यों में विभिन्‍न विधिक अधिनियमों के अंतर्गत आयात तथा निर्यात पर निषेधों तथा प्रतिबंधों का प्रवर्तन, मादक औषध (ड्रग) अवैध व्‍यापार निषेध तथा अंतरराष्ट्रीय यात्री क्‍लियरेंस सहित तस्‍करी की रोकथाम शामिल है।

एसईजेड, ईओयू तथा डीटीए किसे कहते हैं?

विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) विशिष्‍ट रूप से वर्णित एक भौगोलिक क्षेत्र होता है जिसे कतिपय आर्थिक कानूनों के प्रयोजनार्थ विदेशी क्षेत्र माना जाता है। इसके पीछे प्रमुख सोच विश्‍वस्‍तरीय इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर का निर्माण करने में सहायता करना है और अधिसूचित क्षेत्रों में प्रोत्‍साहनों का एक पैकेज प्रदान करना है जहां विनिर्माता, सेवा प्रदाता तथा व्‍यापारी झंझट-मुक्‍त वातावरण में परिचालन कर सकें और निर्यात को बढ़ावा दे सकें। इस दिशा में एसईजेड अधिनियम, 2005 को अधिनियमित किया गया और एसईजेड नियम, 2006 अधिसूचित किए गए। उत्‍पाद शुल्‍क, सेवा कर, केंद्रीय बिक्री कर, मूल्‍य योजित कर, आयकर आदि से संबंधित कई अन्‍य सम्‍बद्ध कानूनों को एसईजेड डेवलपरों, जो आवश्‍यक इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर का निर्माण तथा रखरखाव करते हैं और एसईजेड के भीतर प्रसंस्‍करण क्षेत्रों में परिचालन करने वाली एसईजेड इकाइयों को आवश्‍यक प्रेरणा प्रदान करने के लिए उपयुक्‍त रूप से संशोधित भी किया गया है।

एसईजेड अधिनियम, 2005 में वर्णित मुख्‍य उद्देश्‍य निम्‍नलिखित हैं :

  • अतिरिक्‍त आर्थिक कार्यकलाप का निर्माण
  • माल तथा सेवाओं के निर्यात का संवर्धन
  • देशी तथा विदेशी स्रोतों से निवेश का संवर्धन
  • रोजगार के अवसरों का सृजन
  • इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर सुविधाओं का विकास।

यथा 2 सितंबर 2016 को 406 एसईजेड के लिए औपचारिक अनुमोदन प्रदान किए गए हैं जिनमें से 328 अधिसूचित किए गए हैं और 204 परिचालनरत हैं जहां 4,166 इकाइयां लगायी गई हैं। एसईजेड में निवेश कुल 3,76,494 करोड़ रुपये रहा। इन क्षेत्रों में 15,91,381 व्‍यक्‍तियों को रोजगार मिला है। एसईजेड इकाइयों का निर्यात 2015-16 में 4,67,337 करोड़ रुपये रहा।

निर्यातोन्‍मुख इकाइयाँ (ईओयू) एक ऐसा शब्‍द है जिसे इलेक्‍ट्रॉनिक्‍स हार्डवेयर टेक्‍नोलॉजी पार्क (ईएचटीपी), सॉफ्टवेयर टेक्‍नोलॉजी पार्क (एसटीपी) तथा बायो टेक्‍नोलॉजी पार्क (बीटीपी) के लिए विशेष योजनाओं के अंतर्गत स्‍थापित इकाइयों को सामूहिक रूप से निर्दिष्‍ट करने के लिए प्रयुक्‍त किया जाता है। ये अपने संपूर्ण उत्‍पादन का निर्यात करने का वचन देती हैं (देशी प्रशुल्‍क क्षेत्र (डीटीए) में अनुमत बिक्री को छोड़कर)। ये इकाइयां मरम्‍मत, पुनर्निर्माण, रीकंडीशनिंग, रीइंजीरियरिंग, सेवा क्षेत्र, साफ्टवेयर विकास, कृषि प्रसंस्‍करण सहित कृषि, मत्‍स्‍यपालन, पशुपालन, बायो-टेक्‍नोलॉजी, पुष्‍पकृषि, बागबानी, कृमिपालन, पोल्‍ट्री तथा रेशम कीटपालन सहित माल के निर्माण में लगी होनी चाहिए। इन योज नाओं के अंतर्गत ट्रेडिंग इकाइयां शामिल नहीं हैं।

 

इन योजनाओं का उद्देश्‍य निर्यात को बढ़ावा देना, विदेशी मुद्रा आय में वृद्धि करना, निर्यात उत्‍पादन के लिए निवेश आकर्षित करना और रोजगार का सृजन करना है। इन इकाइयों को प्रोत्‍साहनों का एक विशेष पैकेज प्रदान किया जाता है। यह पैकेज उन्‍हें मुख्‍यत: शुल्‍क-मुक्‍त इंक्‍लेव मानता है जिन्‍हें देश में कहीं भी स्‍थापित किया जा सकता है। कुछ क्षेत्रों के जहां उच्‍चतर मूल्‍य योजन अपेक्षित है को छोड़कर ईओयू / ईएचटीपी / बीटीपी इकाइयां निवल विदेशी मुद्रा अर्जक होनी चाहिए, हाल तक, अधिकांश ईओयू से बांडेड वेयरहाउस के रूप में कार्य करना अपेक्षित था, किंतु अब यह अपेक्षा खत्‍म कर दी गयी है।

देशी प्रशुल्‍क क्षेत्र (डीटीए) एसईजेड तथा ईओयू से भिन्‍न अन्‍य सभी क्षेत्रों से संबंधित है। डीटीए इकाइयों पर निर्यात करने की तब तक कोई बाध्‍यता नहीं होती है, जब तक कि वे निर्यात उत्‍पादन के लिए कोई शुल्‍क-मुक्‍त निविष्‍टि या शुल्‍क-मुक्‍त पूंजीगत माल प्राप्‍त नहीं करती हैं। उन पर इस बात का कोई प्रतिबंध नहीं होता है कि वे डीटीए में कितना बेच सकती हैं। डीटीए के भीतर पूर्वोत्‍तर, सिक्‍किम, हिमाचल प्रदेश, जम्‍मू व कश्‍मीर तथा उत्‍तराखंड में विनिर्माताओं को कुछ विशेष रियायतें तथा प्रोत्‍साहन जैसे उत्‍पाद-शुल्‍क छूट या रिफंड मिलता है।

आईईसी किसे कहते हैं? आईईसी कैसे मिल सकता है?

आयातक–निर्यातक कोड (आईईसी) आयात या निर्यात करने के इच्‍छुक व्‍यक्‍ति को आबंटित 10 अंकों का एक अल्फ़ा न्यूमेरिक कोड होता है। आईईसी नंबर प्राप्‍त किए बिना किसी व्‍यक्‍ति द्वारा कोई निर्यात या आयात नहीं किया जा सकता है। सार्वजनिक सूचना सं। 1 दिनांक 1।4।2015 के जरिए विदेश व्‍यापार महानिदेशक (डीजीएफटी) द्वारा अधिसूचित प्रक्रिया पुस्‍तिका, खंड-1 (एच बी 1) के पैरा 2।07 में सूचीबद्ध कतिपय आयातकों या निर्यातकों https://dgft.gov.in/sites/default/files/ftproc17-051217 लिंक देखें) की श्रेणियों को आईईसी प्राप्‍त करने से छूट प्राप्‍त है।

आयातकों तथा निर्यातकों की कुछ श्रेणियों को डीजीएफटी द्वारा स्‍थायी आईईसी भी प्रदान किया जाता है, जैसाकि एचबी-1 के पैरा 2।08 में सूचीबद्ध है। उन्‍हें अलग से आईईसी प्राप्‍त करने की आवश्‍यकता नहीं है क्‍योंकि वे उन्‍हें दिए गए स्‍थायी आईईसी का प्रयोग कर सकते हैं। मोटे तौर पर इन श्रेणियों में केन्‍द्र या राज्‍य सरकार, उनके पूर्ण या आंशिक स्‍वामित्‍व वाली एजेंसियां (वाणिज्‍यिक संगठनों से भिन्‍न), अपने व्‍यक्‍तिगत उपयोग के लिए आयात करने वाले व्‍यक्‍ति / अस्‍पताल /या संस्‍थाएं (जो व्‍यापार से न जुड़ी हों), निर्दिष्‍ट सीमा तक नेपाल, म्‍यांमार, चीन आदि के साथ स्‍थल द्वारा सीमा-पार व्‍यापार में लगे व्‍यक्‍ति तथा इसी प्रकार अन्‍य शामिल हैं।

ई-आईईसी आवेदन के लिए विस्तृत दिशानिर्देश https://dgft.gov.in/sites/default/files/ft17-051217.pdf र पैरा उपलब्ध है। पैरा 2.05 से 2.15 में आईईसी की प्रक्रिया दी गई है।

आईईसी प्राप्‍त करने के लिए आपके पास आयकर विभाग से जारी स्‍थायी लेखा संख्‍या (पैन) होना चाहिए। आपको अपने पैन पर एक से अधिक आईईसी नहीं मिल सकता है। आपको आईईसी आवेदन में अपनी सभी शाखाओं, डिविजनों, फैक्‍टरियों की सूची देनी होगी।

ई-आईईसी आवेदन विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी- dgft.gov.in) पर किया जा सकता है। आवेदक अपने दस्तावेज अपलोड कर सकते हैं और आवश्यक फीस का भुगतान नेट बैंकिंग के जरिए कर सकते हैं। तथापि, आवेदक को अपना विधिवत डिजिटल हस्ताक्षरित आवेदन ऑनलाइन प्रस्तुत करना चाहिए। डीजीएफटी के क्षेत्रीय प्राधिकरण द्वारा ऐसे आवेदनों पर ऑनलाइन ही कार्रवाई की जाती है और डिजिटल हस्ताक्षरित ई-आईईसी आवेदक को दो कार्यदिवसों के भीतर जारी / ईमेल कर दिया जाता है। यदि आवेदन अधूरा होता है या किसी अन्य कारण से अयोग्य होता है तो इसे खारिज कर दिया जाता है और खारिज किए जाने के कारणों सहित इसकी सूचना पत्र / ईमेल के माध्यम से आवेदक को भेज दी जाती है। ई-आईईसी जारी करने के लिए आवेदन ईबिज प्लेटफॉर्म (www.ebiz.gov.in) से भी किया जा सकता है।

आईईसी प्राप्त करने के लिए आवेदन लागू शुल्क और आवश्यक दस्तावेजों के साथ एएनएफ 2 ए में ऑनलाइन दायर किया जा सकता है। आईईसी सिस्टम ऑटो जनरेटेड होगा और आवेदक को ई-मेल और एसएमएस के माध्यम से सूचित किया जाएगा कि एक कंप्यूटर उत्पन्न ई-आईईसी अपनी पंजीकृत ईमेल आईडी पर उपलब्ध है। आईईसी मॉड्यूल में लॉग इन करके आवेदन जमा करने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद आवेदक अपने ई-आईईसी को देख और प्रिंट कर सकता है।

आईईसी आवेदन के साथ आवेदकों को निम्नलिखित विवरण / दस्तावेजों के साथ ऑनलाइन आवेदन जमा करने की आवश्यकता है (आपकी स्कैन की गई प्रतियां जमा / अपलोड करनी हैं):

  • निर्धारित प्रारूप में चेक असर इकाई या बैंक प्रमाण पत्र का पूर्व-मुद्रित नाम ANF-2A (I);
  • आवेदन में व्यापक रूप में आवेदक इकाई का पता प्रमाण।

दिशानिर्देशों के अनुसार आरए ऑनलाइन आईईसी के बाद सत्यापन का संचालन करेंगे।

एचबी–1 के परिशिष्‍ट - 2 में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार, आईईसी आवेदन के लिए निर्धारित फीस () इलेक्‍ट्रॉनिक रूप में अदा की जानी चाहिए। आवेदक को अपने अधिकार क्षेत्र का क्षेत्रीय अधिकारी सूचित करना होगा जो आवेदन की प्रोसेसिंग करेगा। डीजीएफटी के क्षेत्रीय प्राधिकारियों और उनके-क्षेत्र की सूची एचबी–1 के परिशिष्‍ट–1ए में दी गई है।

आईईसीएस / ई-आईआईसीसी में संशोधन केवल ऑनलाइन दानकर्ता हो सकता है। उनके आईईसी / ई-आईईसी में संशोधन की मांग करने वाले आवेदक dgft.nic.in पर लॉग ऑन कर सकते हैं और त्वरित लिंक के तहत आयातक निर्यातक कोड (आईसीसी) पर क्लिक कर सकते हैं और अपने ई-आईसीएस और आईसीएस को भौतिक प्रारूप में संशोधित करने के लिए "अपना आईसीसी संशोधित करें" का चयन कर सकते हैं। आवेदक शुल्क और आवश्यक दस्तावेज

निर्यात संवर्धन परिषदें क्‍या हैं? आरसीएमसी प्राप्‍त करने से क्‍या फायदे हैं?

निर्यात संवर्धन परिषदें भारतीय निर्यात को विकसित करने तथा बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से स्‍थापित निर्यातकों का एक संगठन है। इनमें से अधिकांश वाणिज्‍य मंत्रालय द्वारा प्रायोजित संगठन हैं। सलाहकारी निकाय के रूप में वे सरकार की नीतियों में सक्रिय रूप से योगदान देते हैं और निर्यातकों तथा सरकार के बीच एक इंटरफेस के रूप में कार्य करते हैं।

वर्तमान में, कुल 29 निर्यात संवर्धन परिषदें (ईपीसी), 6 कमोडिटी बोर्ड तथा 2 निर्यात विकास प्राधिकरण हैं जो निर्यात को बढ़ावा देने के लिए उत्‍तरदायी हैं। एचबी – 1 के परिशिष्‍ट 2टी में दिए गए रूप में उत्‍पादों / परियोजनाओं / सेवाओं के विशिष्‍ट समूह के लिए एक निर्यात संवर्धन परिषद है। भारतीय निर्यात संगठन महासंघ (एफआईईओ) इन संगठनों का शीर्ष निकाय है। कॉफी, कॉयर, नारियल, मसाला, तम्‍बाकू तथा चाय हेतु कमोडिटी बोर्ड निर्यात संवर्धन से आगे तक जाते हैं। वे उत्‍पादकता में वृद्धि तथा उत्‍पाद विशाखन पर फोकस के साथ अपने उत्‍पादों के लिए देश में एकीकृत विकास, खेती तथा उद्योग पर विशेष ध्‍यान देते हैं। इनमें से कुछ विभिन्‍न मंत्रालयों द्वारा स्‍थापित किए गए है, उदाहरण के तौर पर, नारियल विकास बोर्ड की स्‍थापना कृषि मंत्रालय द्वारा की गई है।

एफटीपी के अंतर्गत किसी लाभ या रियायत के लिए आवेदन करने वाले किसी भी व्‍यक्‍ति को जब तक एफटीपी के अंतर्गत अन्‍यथा विशिष्‍ट रूप से छूट प्राप्‍त न हो, एचबी–1 में निर्दिष्‍ट प्रक्रिया के अनुसार निर्यात संवर्धन परिषद बोर्ड के सक्षम प्राधिकारी द्वारा मंजूर पंजीकरण सह सदस्‍यता प्रमाणपत्र (आरसीएमसी) प्रस्‍तुत करना होगा या उसे डीजीएफटी की वेबसाइट पर आयातक–निर्यातक प्रोफाइल में अपलोड करना होगा। मसाला बोर्ड द्वारा जारी मसाले के निर्यातक के रूप में पंजीकरण प्रमाणपत्र (सीआरईएल) को एफटीपी के प्रयोजनार्थ आरसीएमसी माना जाता है। उत्‍पाद-शुल्‍क कानून के अंतर्गत भी आरसीएमसी धारित करने वाले मर्चेंट निर्यातक को उस बांड के समर्थन में स्‍योरिटी या सिक्‍यूरिटी प्रस्‍तुत करने की आवश्‍यकता नहीं होती है जिसे वह ड्यूटी का भुगतान किए बिना विनिर्माता के परिसर से निर्यात माल उठाने के लिए देता है।

अधिकांश ईपीसी नियमित आधार पर देश तथा विदेश दोनों में संवर्धनात्‍मक कार्यक्रम चलाते हैं इनमें चुनिंदा देशों के लिए उत्‍पाद विशिष्‍ट प्रतिनिधि मंडल भेजना, भारतीय प्रदर्शनियों का आयोजन, विशेषीकृत व्‍यापार मेलों में देश की सहभागिता, कैटलॉग प्रदर्शनी, क्रेता – विक्रेता बैठकों का आयोजन, उत्‍पाद विशिष्‍ट सेमिनार तथा सम्‍मेलनों का आोजन आदि प्रमुख है। इनमें से कुछ के कार्यालय विदेशों में स्‍थित हैं। वे विदेशों में कारोबारी दौरों के लिए विजा में सहायता प्रदान करते हैं, सदस्‍यों को पत्रिकाएं भेजते हैं जिनमें सार्वभौमिक निविदाएं, परियोजनाएं, पूछताछ, सरकारी अधिसूचनाएं, बाजार रिपोर्टें, फॉरेक्‍स दरें, स्‍टील की कीमतें आदि के बारे में जानकारी होती है इसके साथ ही; व्‍यापार अवसरों पर सूचनाएं तथा निविदाओं सहित, निर्यातक की वेबसाईट को होस्‍ट / हाइपर लिंक करते हुए अपनी वेबसाईट के माध्‍यम से अपने सदस्‍यों के उत्‍पादों के लिए विश्‍वव्‍यापी कवरेज प्रदान करते हैं और मार्केटिंग, प्रदर्शनियों आदि के लिए सरकारी सब्‍सिडी प्राप्‍त करने में अपने सदस्‍यों की सहायता करते हैं।

कमोडिटी बोर्ड एक कदम और आगे जाते हैं। उदाहरण के लिए, नारियल विकास बोर्ड नारियल की खेती तथा उद्योग में लगे लोगों को तकनीकी सलाह देता है, नारियल के अंतर्गत रकबे में विस्‍तार के लिए वित्‍तीय तथा अन्‍य सहायता प्रदान करता है, नारियल तथा उसके उत्‍पादों के प्रसंस्‍करण के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकी अपनाने के लिए प्रोत्‍साहित करता है, नारियल तथा उसके उत्‍पादों के विपणन में सुधार लाने और नारियल तथा उसके उत्‍पादों के आयात तथा निर्यात को विनियमित करने के उपायों की सिफारिश करता है, नारियल तथा उसके उत्‍पादों के लिए ग्रेडिंग, विनिर्देशन तथा मानक नियत करता है, नारियल का उत्‍पादन बढ़ाने के लिए तथा नारियल की गुणवत्‍ता और पैदावार में सुधार लाने के लिए उपयुक्‍त योजनाओं का वित्‍तपोषण करता है।

इसलिए लगभग सभी निर्यातक किसी न किसी ईपीसी से आरसीएमसी अवश्‍य प्राप्‍त करते हैं।

अभिरक्षकों की क्‍या भूमिका होती है? उनके दायित्‍व क्‍या हैं?

सीमा-शुल्‍क क्षेत्र में उतारे गए सभी आयातित माल के संबंध में सीमा-शुल्‍क आयुक्‍त को एक अभिरक्षक (कस्‍टोडियन) नियुक्‍त करना होता है जिसकी अभिरक्षा में आयातित माल घरेलू उपयोग के लिए निकासी किए जाने तक या कानून में उपबंधित रूप में गोदाम में रखे जाने या वाहनांतरित किए जाने तक रहेंगे।

कस्‍टोडियन से यह अपेक्षित है कि वह कैरियर से आयातित माल का प्रभार ग्रहण करे, उसके उचित भंडारण तथा सुरक्षा की व्‍यवस्‍था करे और आयातकों द्वारा सभी सीमा-शुल्‍क औपचारिकताओं को पूरा करने, आवश्‍यक शुल्‍क तथा अन्‍य प्रभारों / शुल्‍कों का भुगतान करने और अन्‍य दायित्‍वों को पूरा करने के बाद ही माल की निकासी की अनुमति दे।

सीमा-शुल्‍क अधिनियम,1962 अभिरक्षकों को बाध्‍य करता है कि वे आयातित माल की सुपुर्दगी तक सुरक्षित अभिरक्षा सुनिश्‍चित करें। यदि उनकी अभिरक्षा में माल की चोरी हो जाती है तो अभिरक्षक को ऐसे माल पर शुल्‍क का भुगतान करना होगा।

सीमा-शुल्‍क आयुक्‍त द्वारा नियुक्‍त अभिरक्षकों के अलावा, सीमा-शुल्‍क अधिनियम, 1962 किसी अन्‍य कानून के अंतर्गत यथा उपबंधित रूप में अन्‍य अभिरक्षकों को भी मान्‍यता प्रदान करता है। उदाहरण के लिए, मुंबई पोर्ट ट्रस्‍ट प्रमुख पत्‍तन न्‍यास अधिनियम, 1963 के अंतर्गत एक विधिक अभिरक्षक है।

कंटेनरकृत परिवहन की वृद्धि को देखते हुए देश के अंत: क्षेत्रों में सीमा-शुल्‍क मंजूरी की सुविधा भी विभिन्‍न अंतर्देशीय कंटेनर डिपो (आईसीडी) खोलकर प्रदान की गई है। आई सी डी एक प्रकार के शुष्‍क पोर्ट हैं और यहां भी माल सीमा-शुल्‍क की अदायगी किए जाने तक अभिरक्षक के पास रहता है।

सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्रों में विभिन्‍न पोर्ट ट्रस्‍ट तथा अन्‍य प्राधिकरण विभिन्‍न पोर्टों, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों / आईसीडी में उनकी अभिरक्षा में रखे गए आयात तथा निर्यात कार्गो को संचालित करते हैं। अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों में कार्गो संचालन तथा अभिरक्षा सामान्‍यत: भारतीय अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा प्राधिकरण (आईएएआई) को सौंपी जाती है किंतु आईएएआई द्वारा निजी क्षेत्र को या इस क्षेत्र में निजी क्षेत्र की प्रत्‍यक्ष संस्‍था को ऐसी सुविधा पट्टे पर देने की प्रवृत्‍ति आज कल काफी बढ़ी है।

अधिकतम आयात तथा निर्यात कार्गो विभिन्‍न समुद्री पोर्टों पर निपटाये जाते हैं और कंटेनरकृत कार्गो परिवहन की प्रवृत्‍ति बढ़ रही है। न्‍हावा शेवा जैसे प्रमुख पोर्टों पर उतारे गए आयात कार्गो को आंतरिक आईसीडी के जरिए क्लियरेंस के लिए आयातकों के द्वार पर भेजा जाता है। चाक चौबंद सुरक्षा व्‍यवस्‍था यह सुनिश्‍चित करती है कि कार्गो में पिल्‍फ्रेज / चोरी न हो। विभिन्‍न गोदियों में अलग-अलग लंगरों पर कार्गो की लदाई तथा उतराई की व्‍यवस्‍था, कंटेनर यार्ड / भंडारण गोदामों आदि सहित विभिन्‍न स्‍थानों पर उनकी आवा-जाही का प्रबंध पोर्ट प्राधिकारियों द्वारा किया जाता है।

सीमा-शुल्‍क प्राधिकारियों को आयात तथा निर्यात के संबंध में अपने कार्यों, जैसे जहाजों / विमानों आदि पर माल की लदाई / उतराई का पर्यवेक्षण, कंटेनरों को भरने या खाली करने का पर्यवेक्षण, सीमा-शुल्‍क निकासी औपचारिकताओं से पहले आयातित / निर्यात के लिए प्रस्‍तुत माल का निरीक्षण तथा जांच आदि को पूरा करने के लिए गोदी क्षेत्रों में तथा अंतरराष्ट्रीय कार्गो कॉम्‍प्‍लेक्‍सों / आईसीडी आदि में उपयुक्‍त कार्यालय स्‍थान तथा आवश्‍यक सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। इस प्रयोजन के लिए तथा सीमा-शुल्‍क क्षेत्र में कार्गो के संचालन, प्राप्‍ति , भंडारण तथा परिवहन के लिए अभिरक्षकों तथा कार्गो सेवा प्रदाताओं (सीसीएसपी) के लिए व्‍यापक दिशानिर्देश प्रदान करने के लिए केन्‍द्रीय उत्‍पाद एवं सीमा-शुल्‍क बोर्ड (सीबीईसी) ने सीमा-शुल्‍क क्षेत्र में कार्गो संचालन विनियम, 2009 तैयार किया है।

सीमा-शुल्‍क ब्रोकर किसे कहते हैं? आयात तथा निर्यात में उनकी क्‍या भूमिकाएं होती हैं?

कस्‍टम हाउस एजेंटों को सीमा-शुल्‍क ब्रोकर कहा जाता है। ये सीमा-शुल्‍क से पहले आयातकों तथा निर्यातकों का प्रतिनिधित्‍व करते हैं और माल के आयात तथा निर्यात के लिए सीमा-शुल्‍क विभाग से मंजूरी प्राप्‍त करते हैं। वे आयातकों की ओर से माल के आयात के लिए आयात-पत्र दाखिल करते हैं और माल के निर्यात के लिए निर्यातकों की ओर से शिपिंग बिल या निर्यात-पत्र दाखिल करते हैं। वे कैरियरों (शिपिंग कंपनियां, एयरलाइन आदि) से आयातित माल के लिए सुपुर्दगी आदेश प्राप्‍त करना, अभिरक्षकों से माल की सुपुर्दगी लेना तथा आयातकों के परिसर के लिए माल के परिवहन की व्‍यवस्‍था करना जैसी सम्‍बद्ध सेवाएं भी प्रदान करते हैं। इसी प्रकार वे निर्यातकों द्वारा भेजे गए निर्यात माल की ट्रान्‍सपोर्टरों से डिलीवरी लेते हैं, गोदी में ले जाने की व्‍यवस्‍था करते हैं और शिपरों को भेजते हैं। अधिकांश आयातक तथा निर्यातक सीमा-शुल्‍क विभाग के माध्‍यम से कार्गो के आयात तथा निर्यात की मंजूरी का कार्य सीमा-शुल्‍क ब्रोकरों से आउटसोर्स करते हैं।

कस्‍टम ब्रोकरों का अच्‍छा तकनीकी ज्ञान तथा आयात एवं निर्यात से संबंधित कानूनों की जटिलताओं की जानकारी होनी जरूरी है। इसलिए ऐसे व्‍यक्‍ति जो सीमा-शुल्‍क ब्रोकर के रूप में कार्य करना चाहते हैं या कारोबार करना चाहते हैं या उनके कर्मचारी भी जो कस्‍टम्‍स के साथ संवाद करते हैं, उन्‍हें कस्‍टम विभाग द्वारा आयोजित परीक्षा उत्‍तीर्ण करने सहित आवश्‍यक प्रतिभूति प्रस्‍तुत करनी होगी तथा सीमा-शुल्‍क विभाग से लाइसेंस प्राप्‍त करना होगा। सीमा-शुल्‍क ब्रोकर्स लाइसेंसिंग विनियम, 2013 में पात्रता मानदंड, परीक्षा हेतु प्रक्रिया तथा लाइसेंस की मंजूरी प्रक्रिया, प्रस्‍तुत की जाने वाली प्रतिभूति, सीमा-शुल्‍क ब्रोकर के दायित्‍व तथा सीमा-शुल्‍क ब्रोकर द्वारा व्‍यक्‍तियों के नियोजन हेतु अनुशासन आदि का प्रावधान है।

सीमा-शुल्‍क ब्रोकर के कुछ महत्‍वपूर्ण दायित्‍व निम्‍नानुसार हैं:

  • विश्‍वसनीय, स्‍वतंत्र, प्रामाणिक दस्‍तावेजों, आंकड़ों तथा सूचना का प्रयोग करते हुए अपने ग्राहक के पूर्ववृत्‍त, आईईसी कोड नंबर की परिशुद्धता, अपने ग्राहक की पहचान तथा घोषित पते पर ग्राहक के कार्य का सत्‍यापन करना और अपने ग्राहक से उसकी ओर से कार्य करने के लिए प्राधिकार पत्र प्राप्‍त करना।
  • अपने ग्राहक को कानूनों का पालन करने के लिए सूचित करना और अपालन की स्‍थित में मामले को सीमा-शुल्‍क विभाग के ध्‍यान में लाना, ग्राहक को दी जाने वाली किसी भी सूचना की सत्‍यता सुनिश्‍चित करना, सीमा-शुल्‍क आयुक्‍त द्वारा जारी कार्गो या बैगिज की निकासी से संबंधित किसी आदेश, अनुदेश या सार्वजनिक सूचना में निहित किसी जानकारी को उस ग्राहक को देने से रोकना जो ऐसी जानकारी के लिए पात्र नहीं है।
  • किसी शुल्‍क, कर या सरकार को देय किसी अन्‍य कर्ज या दायित्‍व के भुगतान के लिए प्राप्‍त राशि की सरकार को शीघ्र अदायगी करना, अपने ग्राहक के लिए प्राप्‍त निधियों का हिसाब रखना।
  • सरकारी रिकॉर्डों या अन्‍य सरकारी स्रोतों से ऐसी किसी प्रकार की सूचना, जिस तक उचित अधिकारी द्वारा पहुँच प्रदान नहीं की गई है, को प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष रूप से प्राप्‍त न करना या प्राप्‍त करने का प्रयास न करना; सीमा-शुल्‍क स्‍टेशन के किसी अधिकारी या उसके अधीनस्‍थ के समक्ष लम्‍बित किसी मामले में धमकी, झूठे आरोप, दबाव या किसी विशेष प्रलोभन के प्रस्‍ताव या लाभ के वचन के प्रयोग द्वारा या कोई उपहार या भेंट या मूल्‍यवान कोई अन्‍य सामान प्रदान कर उसके आचरण को प्रभावित करने का प्रयास न करना।
  • सभी दस्‍तावेजों तथा लेखों का अद्यतन रेकॉर्ड रखना।

इस प्रकार, सीमा-शुल्‍क ब्रोकर आयात तथा निर्यात की आपूर्ति श्रृंखला में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। कुछ आयातक या निर्यातक कुशल एवं भरोसेमंद सीमा-शुल्‍क ब्रोकरों की सहायता के बिना अपना आयात – निर्यात कारोबार करने की परिकल्‍पना नहीं कर सकते।

वाहकों (कैरियरों) के दायित्‍व क्‍या हैं ? आईजीएम या ईजीएम किसे कहते हैं? आयातकों या निर्यातकों के लिए इनके क्‍या मायने हैं?

आयात तथा निर्यात को विनियमित करने और उन पर प्रभावी नियंत्रण रखने के लिए सीमा-शुल्‍क अधिनियम, 1962 वाहकों (कैरियरों) पर कुछ दायित्‍व डालता है। इस प्रकार, उन्‍हें देश में आयातित कार्गो को उतराई के लिए सिर्फ अधिसूचित पोर्टों / हवाई अड्डों / स्‍थल सीमा-शुल्‍क केन्‍द्रों पर लाना होगा और उस विशिष्‍ट पोर्ट / अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतराई के लिए लाये गए माल तथा आगे दूसरे पोर्टो / हवाई अड्डों पर ले जाये जाने वाले माल के बारे में सीमा-शुल्‍क विभाग को विस्‍तृत जानकारी प्रस्‍तुत करनी होगी।

कस्‍टम स्‍टेशन में पोत / विमान के आगमन से पूर्व ‘’आयात सामान्‍य मालसूची ‘’ (आईजीएम) में ऐसे कार्गो की घोषणा की जानी चाहिए। स्‍थल सीमा-शुल्‍क स्‍टेशनों के माध्‍यम से आयात के मामले में वाहन का प्रभार रखने वाले व्‍यक्‍ति को उसके पहुंचने के 12 घंटे के भीतर इसी प्रकार की आयात रिपोर्ट देनी होगी। आईजीएम में चार भाग होते हैं – देशी निकासी के लिए कार्गो, दूसरे पोर्ट के लिए परिवहन हेतु कार्गो, पोत- भंडार तथा उसी तल रखने के लिए कार्गो जो पोत में रहेगा।

चूंकि कार्गो निकासी औपचारिकताएं सामान्‍यत: किसी पोत द्वारा लाये जा रहे कार्गो की पोर्ट पर उतराई के बारे में सूचना से जुड़ी होती हैं इसलिए, यदि किसी पोर्ट के लिए संबंधित कार्गो के सभी विवरण पोत के पहुंचने से पहले उपलब्‍ध होने आईजीएम पहले फाइल किया जाना चाहिए। अंतिम आईजीएम पोत के पहुंचने के बाद फाइल किया जा सकता है। आई जी एम की विधिवत प्राप्ति के बाद सीमा-शुल्‍क विभाग के निवारण प्राधिकारियों के पर्यवेक्षण में उतराई शुरू होती है। कानून में ऐसे किसी सीमा-शुल्‍क स्‍टेशन पर माल की उतराई निषिद्ध है जिसका उल्‍लेख आईजीएम या आयात रिपोर्ट में नहीं है।

इसी प्रकार कोई भी पोत / विमान निर्यात के लिए माल की लदाई तब तक शुरू नहीं कर सकता है जब तक सीमा-शुल्‍क विभाग को उसकी सूचना नहीं दी जाती है और लदान के लिए उसकी अनुमति प्राप्‍त नहीं होती है इस अनुमति पत्र को लदान पत्र पर “लेट एक्‍सपोर्ट ऑर्डर” भी कहा जाता है। पोतों / विमानों आदि पर कार्गो के लदान का सीमा-शुल्‍क प्राधिकारियों द्वारा जांच और पर्यवेक्षण किया जाता है, जो यह सुनिश्‍चित करते हैं कि लदान किए गए कार्गो ने निर्धारित सीमा-शुल्‍क औपचारिकताओं जैसे शुल्‍क या कर, जहां लागू हो, के भुगतान सहित कानून द्वारा निर्धारित अन्‍य औपचारिकताओं को पूरा किया है और निर्यात के लिए सीमा-शुल्‍क निकासी औपचारिकताओं संबंधी प्राधिकार उचित अधिकारी द्वारा विधिवत दिया गया है।

पोत / विमान के प्रभारी को एक निर्धारित फॉर्म, जिसे “निर्यात सामान्‍य मालसूची” (ईजीएम) कहा जाता है, में पोत / विमान में लादे गए समस्‍त माल के विवरण प्रस्‍तुत करने होते हैं। इसी प्रकार वाहन के प्रभारी को “निर्यात रिपोर्ट “ नामक एक प्रकार की रिपोर्ट प्रस्‍तुत करनी चाहिए। ईजीएम / निर्यात रिपोर्ट पोत /विमान / वाहन के प्रस्‍थान करने से पूर्व प्रस्‍तुत की जानी चाहिए इसे पोतलदान / निर्यात के प्रमाण के रूप में माना जाता है।

जब तक आईजीएम निर्धारित प्ररूप में प्रस्‍तुत नहीं किया जाती है, सामान्‍य परिस्‍थितियों में किसी पोत / विमान / वाहन से कार्गो की कोई उतराई शुरू नहीं की जा सकती है। अतः तब तक आयातक सीमा-शुल्‍क विभाग से मंजूरी प्राप्‍त नहीं कर सकते हैं या आयातित कार्गो की डिलीवरी प्राप्‍त नहीं कर सकते हैं। इसी प्रकार जब तक ईजीएम फाईल नहीं किया जाता है, ड्यूटी ड्रॉ बैक जैसे लाभ निर्यातकों को दिए नहीं जा सकते हैं। इस प्रकार आईजीएम / ईजीएम का प्रस्‍तुतीकरण आयात / निर्यात के लिए अनिवार्य है।

मेरे द्वारा आयात की जाने वाली मद पर किसी प्रतिबंध का पता मुझे कैसे लग सकता है?

वाणिज्‍य मंत्रालय ने निर्यात तथा आयात मदों के लिए वर्गीकरण का भारतीय व्‍यापार वर्गीकरण (एच एस) जारी किया है जिसे आईटीसी (एचएस) के रूप में जाना जाता है। आईटीसी (एचएस) प्रणाली को विश्‍व सीमा-शुल्‍क संगठन (http://www।wcoomd।org) द्वारा जारी अंतरराष्ट्रीय नामावली सामंजस्‍यीकृत प्रणाली (एचएसएन) के साथ 6 अंकीय स्‍तर पर समनुरूपित किया गया है। तथापि आईटीसी (एचएस) 8/10 अंक स्‍तर पर है जिसे htpp://dgft।gov।in से डाउनलोड किया जा सकता है। आईटीसी (एचएस) की अनुसूची 1 में आयात नीति व्‍यवस्‍था का प्रावधान करती है।

आईटीसी (एचएस) वर्गीकरण में पण्‍यों / उत्‍पादों को एक निश्‍चित पैटर्न में व्‍यवस्‍थित किया जाता है, जिनमें से हरेक के सामने ‘मुक्‍त’, ‘प्रतिबंधित’, एसटीई (राज्‍य व्‍यापार) या ‘निषिद्ध’ का उल्‍लेख होता है। आईटीसी (एचएस) में 21 खंड तथा 99 अध्‍याय हैं। एक खंड कई अध्‍यायों से युक्‍त एक समूह है जो माल के किसी विशिष्‍ट वर्ग को सूचीबद्ध करते हैं। अध्‍याय में चार अंकीय, छ: अंकीय तथा आठ अंकीय स्‍तरों पर व्‍यवस्‍थित पण्‍यों का संक्षिप्‍त विवरण होता है। प्रत्‍येक चार अंकीय कोड को ‘शीर्षक’ कहा जाता है और प्रत्‍येक छ: अंकीय कोड को ‘उप-शीर्षक’ कहा जाता है और प्रत्‍येक 8 या 10 अंकीय कोड को एक्ज़िम कोड कहा जाता है। हरेक अध्‍याय में माल के क्रम का स्‍वरूप, प्राकृतिक उत्‍पाद, कच्‍चा माल, अर्द्ध तैयार माल / वस्‍तु / मशीनरी आदि के अनुक्रम में पण्‍यों / उत्‍पादों के निर्माण की बढ़ती मात्रा में है। उदाहरण के लिए कॉटन पर अध्‍याय अपरिष्‍कृत कॉटन से शुरू होता है और यार्न, फैब्रिक तथा मेड अप्‍स तक जाता है। आईटीसी (एचएस) आयात नीतियां में हरेक 4 / 6 / 8 / 10 अंकीय एक्‍जिम कोड के सामने सूचित की जाती हैं।

अत: किसी मद के लिए आयात नीति के लिए पहले संबंधित कोड में जाकर, उसके बाद अध्‍याय, उसके बाद शीर्षक, उसके बाद उप-शीर्षक, उसके बाद एक्‍जिम कोड में जाना होता है जहां उसके सामने ‘मुक्‍त’, ‘प्रतिबंधित’, ‘निषिद्ध’ या ‘एसटीई’ (राज्‍य व्‍यापार) के रूप में आयात नीति दी गई रहती है।

आईटीसी (एचएस) में किसी पण्‍य के लिए या तो चार अंकीय, छ: अंकीय या आठ अंकीय स्‍तर पर किसी विशिष्‍ट शीर्षक / उप शीर्षक पर पहुंचने की प्रक्रिया “वर्गीकरण” कहलाती है। खंडों तथा अध्‍यायों के शीर्षक सिर्फ संदर्भ के लिए दिए गए हैं। कानूनी प्रयोजनों के लिए किसी मद के वर्गीकरण का निर्धारण करने के लिए खंड नोटों, अध्‍याय नोटों, उप शीर्षकों, अनुपूरक नोटों के पाठ, शीर्षक, उप शीर्षक तथा आईटीसी (सीएस) की व्‍याख्‍या हेतु सामान्‍य नियम का आश्रय लिया जाना चाहिए। आईटीसी (एचएस) में माल के वर्गीकरण के लिए 6 नियम हैं। इन नियमों का प्रयोग अनुक्रमिक रूप में किया जाना चाहिए। इसके अलावा, मदों के एक विस्‍तृत समूह के लिए कुछ प्रतिबंधों को शामिल करते हुए आईटीसी (एचएस) के प्रारंभ में कुछ सामान्‍य नोट दिए गए हैं। प्रत्‍येक अध्‍याय में शामिल की गई मदों के लिए नीति हरेक अध्‍याय के अंत में दी गयी है। कोई संदेह होने पर, डब्‍ल्‍यूसीओ द्वारा प्रकाशित एचएसएन पर व्‍याख्‍यात्‍मक टिप्‍पणियों, डीजीएफटी या सीबीईसी द्वारा दिए गए स्‍पष्‍टीकरणों या वर्गीकरण पर किसी निर्णय का भी संदर्भ लिया जा सकता है।

‘मुक्‍त’ का अर्थ है, उस मद का आयात करने के लिए कोई लाइसेंस या अनुमति आवश्‍यक नहीं है। किन्‍तु यदि आईटीसी (एचएस) उस मद के आयात के लिए कोई शर्त नियत करता है तो उन शर्तों का पालन करना होगा। ‘प्रतिबंधित’ का अर्थ है, मद डीजीएफटी द्वारा जारी लाइसेंस या अनुमति पर ही आयात की जा सकती है। एसटीई का अर्थ है, मद के आयात के लिए नामित राज्‍य व्‍यापार उद्यम (जैसे एसटीपी, एमएमटीसी ) द्वारा उस मद का आयात किया जा सकता है। ‘निषिद्ध’ का अर्थ है कि मद का आयात बिल्‍कुल नहीं किया जा सकता है।

देशी रूप में उत्‍पादित माल के लागू देशी कानून / नियम / आदेश / विनियम / तकनीकी विनिर्देशन / पर्यावरणात्‍मक / सुरक्षा / स्‍वास्‍थ्‍य मानदंड आयातों पर, जब तक विशिष्‍ट रूप से छूट प्राप्‍त न हो, यथोचित परिवर्तनों के साथ लागू होंगे। इस प्रकार किसी अन्‍य प्राधिकारी द्वारा लगाये गए किसी उत्‍पाद विशिष्‍ट प्रतिबंध का भी आयातक द्वारा पालन किया जाना चाहिए।

आयात शुल्‍क के विभिन्‍न प्रकार कौन-से हैं?

आयातित माल पर विभिन्‍न प्रकार के सीमा-शुल्‍क तथा उपकर लगाये जाते हैं।

आयातित माल पर मूल सीमा-शुल्‍क (बीसीडी) सीमा-शुल्‍क टैरिफ अधिनियम, 1975 की अनुसूची – 1 में निर्धारित दरों पर लगाया जाता है। बीसीडी वस्‍तुत: आयात को महँगा बनाने के लिए आशयित है ताकि देशी उद्योग को उस सीमा तक संरक्षण प्रदान किया जा सके और राजस्‍व जुटाया जा सके। बीसीडी यथामूल्‍य (एडवेलोरम) आधार पर अर्थात् माल के मूल्‍य के प्रतिशत के रूप में या विशिष्‍ट आधार पर अर्थात् प्रति यूनिट आधार पर व्‍यक्‍त किया जा सकता है।

अतिरिक्‍त सीमा-शुल्‍क, जिसे सामान्‍यत: प्रतिकारी शुल्‍क (सीवीडी) कहा जाता है, यह सुनिश्‍चित करने के लिए लगाया जाता है कि आयातित माल पर वही शुल्‍क लगे जो देशी रूप से उत्‍पादित माल पर लगता है। इस प्रकार, यह समान माल (यदि भारत में निर्मित होता है) पर लगाये जाने वाले उत्‍पाद शुल्‍क के समतुल्‍य है। यह माल के मूल्‍य + बीसीडी पर लगाया जाता है। सीवीडी सीमा-शुल्‍क टैरिफ अधिनियम, 1975 की धारा 3(1) के अंतर्गत लगाया जाता है।

सीमा-शुल्‍क टैरिफ अधिनियम, 1975 की धारा 3(3) के अंतर्गत लगाया जाने वाला अन्‍य अतिरिक्‍त सीमा-शुल्‍क ऐसी वस्‍तुओं के उत्‍पादन या निर्माण में प्रयुक्‍त किसी कच्‍चे माल, घटक या उसी स्‍वरूप के संघटकों पर लगाये जाने वाले उत्‍पाद शुल्‍क को प्रति-संतुलित करना चाहता है। यह लेवी उस समय उपयोगी होती है जब देशी रूप से विनिर्मित माल को उत्‍पाद शुल्‍क के भुगतान से छूट प्राप्‍त है। वर्तमान में यह केवल घरेलू उपयोग के लिए स्‍टेनलेस स्‍टील वस्‍तुओं तथा ट्रान्‍सफॉर्मर ऑयल पर लगाया जाता है। यह माल के निर्धारणीय मूल्‍य, बीसीडी, सीवीडी, शिक्षा उपकर तथा माध्‍यमिक एवं उच्‍चतर शिक्षा उपकर के कुल योग पर लगाया जाता है।

एक अन्‍य अतिरिक्‍त सीमा-शुल्‍क, जिसे सामान्‍यत: विशेष अतिरिक्‍त शुल्‍क (एसएडी) बिक्री कर या मूल्‍य योजित कर की घटना का प्रतिकार करने के लिए लगाया जाता है जो देशी उत्‍पादकों को भारत में अपना माल बेचने पर अदा करना होता है। वर्तमान में यह 4 प्रतिशत है जो माल के निर्धारणीय मूल्‍य, बीसीडी, सीवीडी, शिक्षा उपकर तथा माध्‍यमिक एवं उच्‍चतर शिक्षा उपकर के कुल योग पर लगाया जाता है।

डम्‍पिंग-रोधी शुल्‍क देशी उत्‍पादकों को डम्‍पिंग अर्थात् सांकेतिक मूल्‍य से कम मूल्‍य पर भारत को निर्यात करने वाले विदेशी आपूर्तिकर्ताओं से बचाने के लिए लगाया जाता है। आयात में उछाल से देशी उत्‍पादकों को अस्‍थायी रूप से संरक्षित करने के लिए संरक्षण शुल्‍क लगाया जाता है। अन्‍य देशों से आर्थिक सहायता प्राप्‍त निर्यात से देशी उत्‍पादकों को संरक्षित करने के लिए डम्‍पिंग-रोधी प्रतिकारी शुल्‍क लगाया जाता है। ये शुल्‍क सीमा-शुल्‍क टैरिफ अधिनियम, 1975की धारा क्रमश: 9ए, 8बी तथा 9 के अंतर्गत सरकार द्वारा अधिसूचित दरों पर तथा निर्दिष्‍ट रूप में लगाये जाते हैं।

आयातित माल पर विभिन्‍न कानूनों के अंतर्गत कई उपकर जैसे शिक्षा उपकर, स्‍वच्‍छ ऊर्जा उपकर आदि लगाये जाते हैं जिन्‍हें सीमा-शुल्‍क के रूप में उसी ढंग से वसूल किया जाता है। इसके अलावा, सीमा-शुल्‍क टैरिफ अधिनियम, 1975 सरकार को आयात शुल्‍क लगाने या बढ़ाने का अधिकार देता है। इस अधिकार का मुश्‍किल से प्रयोग किया गया है।

‘राष्‍ट्रीय आपदा आकस्‍मिकता शुल्‍क’ (एनसीसीडी) प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने के लिए निधियों का एक तैयार कोष निर्मित करने के उद्देश्‍य से पान मसाला, तम्‍बाकू उत्‍पादों तथा विशिष्‍ट आधार पर अपरिष्‍कृत पेट्रोलियम तथा दुपहिया और मोटर वाहनोंपर 1% (निर्धारणीय मूल्‍य + सीवीडी) की दर से लगाया जाता है।

मेरे द्वारा आयात की जाने वाली मदों पर लगने वाले शुल्‍क का पता मुझे कैसे चल सकता है?

आयातित माल पर देय शुल्‍क का निर्धारण करने के लिए पहला कदम है सीमा-शुल्‍क टैरिफ अधिनियम, 1975 की अनुसूची -1, जिसमें सभी मदों को 21 खंडों तथा 98 अध्‍यायों में शामिल किया गया है, में माल सही वर्गीकरण प्राप्‍त करना। हरेक अध्‍याय में 4 अंकीय स्‍तर पर कई शीर्षक, 6 अंकीय स्‍तर पर उप-शीर्षक तथा 8 अंकीय स्‍तर पर टैरिफ लाइनें दी गई हैं। टैरिफ में मद का पता लगाने के लिए खंड टिप्‍पणियों, अध्‍याय टिप्‍पणियों तथा टैरिफ की व्‍याख्‍या के लिए नियमों को देखना होगा।

माल का वर्गीकरण करते समय मुख्‍य आधार "सांविधिक परिभाषा” और विश्‍व सीमा-शुल्‍क संगठन की एचएसएन व्‍याख्‍यात्‍मक टिप्‍पणियों में दिए गए दिशानिर्देश हैं। “व्‍यापार अर्थ” को उचित महत्‍व दिया जाना चाहिए, जब तक स्‍वयं टैरिफ शब्‍द का तकनीकी भाव में व्‍याख्‍या करने की अपेक्षा न करे, ऐसे मामलों में तकनीकी शब्‍दकोशों का प्रयोग किया जाना चाहिए। केन्‍द्रीय उत्‍पाद एवं सीमा-शुल्‍क बोर्ड ने वर्गीकरण पर कई स्‍पष्‍टीकरण जारी किए हैं और स्‍पष्‍टीकरणों पर कई केस कानून भी हैं। संदेह की स्‍थिति में, अग्रिम निर्णय प्राधिकारी से बाध्‍यकारी निर्णय प्राप्‍त किया जा सकता है।

जब वर्गीकरण हो जाता है, उस मद के सामने टैरिफ अनुसूची में निर्दिष्‍ट शुल्‍क-दर, जिसे ‘शुल्‍क की टैरिफ दर’ कहा जाता है, आधार हो जाती है। अगला कदम यह जांचना होता है कि क्‍या वित्‍त मंत्रालय द्वारा जारी किसी छूट अधिसूचना में यह मद शामिल है। छूट अधिसूचना के साथ पठित टैरिफ दर मूल सीमा-शुल्‍क दर (बीसीडी) का निर्धारण करने के लिए शुल्‍क की प्रभावी दर सूचित करती है।

समान मदों, यदि भारत में निर्मित के लिए सीमा-शुल्‍क टैरिफ अधिनियम, 1975 की धारा 3(1) के अंतर्गत मद पर लगने वाले अतिरिक्‍त सीमा-शुल्‍क (सीवीडी) का निर्धारण करने के लिए वही प्रक्रिया अपनायी जानी चाहिए। केन्‍द्रीय उत्‍पाद शुल्‍क टैरिफ अधिनियम, 1985 को सीमा-शुल्‍क टैरिफ अधिनियम, 1975 के साथ समनुरूपित किया गया है और इसलिए वर्गीकरण दोनों कानूनों के अंतर्गत एक ही होगा। यहां पुन:, छूट अधिसूचना के साथ पठित टैरिफ दर उत्‍पाद-शुल्‍क की प्रभावी दर सूचित करती है। यह शुल्‍क दर सीवीडी लगाने के लिए अपनायी जानी चाहिए जो समान मदों, यदि भारत में निर्मित या उत्‍पादित, पर लगने वाले उत्‍पाद शुल्‍क के समतुल्‍य है।

बीसीडी + सीवीडी पर 2% शिक्षा उपकर लगाया जाता है और बीसीडी + सीवीडी पर 1% की दर से माध्‍यमिक एवं उच्‍चतर शिक्षा उपकर लगाया जाता है। सीमा-शुल्‍क टैरिफ अधिनियम, 1975 की धारा 3(5) के अंतर्गत अतिरिक्‍त सीमा-शुल्‍क (सीवीडी), जिसे एसएडी कहा जाता है, 4% है। क्‍या विचाराधीन मद के लिए ईसी, एसएचई या एसएडी से छूट प्राप्‍त है। इसकी जांच छूट अधिसूचना से कर लेनी चाहिए।

उसके बाद, डम्‍पिंग-रोधी, सुरक्षा शुल्‍क तथा डम्‍पिंग-रोधी प्रतिकारी शुल्‍क से संबंधित अधिसूचनाएं यह जांचने के लिए देखी जानी चाहिएं कि क्‍या आयात की मद पर इनमें से कोई शुल्‍क लगाया गया है। ये अधिसूचनाएं प्रति यूनिट आधार पर या आयातित माल के मूल्‍य से आधिक्‍य राशि पर तथा इसी प्रकार लगाये जाने वाले शुल्‍क को व्‍यक्‍त करते हैं।

अंत में, विभिन्‍न कानूनों के अंतर्गत उत्‍पाद विशिष्‍ट उपकर लगाये जाते हैं। इनमें से कुछ छूट अधिसूचनाओं में शामिल हो सकते हैं।

आयातित माल के लिए सीमा-शुल्‍क मंजूरी की मूलभूत प्रक्रियाएं कौन-सी हैं?

सीमा-शुल्‍क विभाग के माध्‍यम से आयातित माल की मंजूरी के लिए पहला कदम आंतरिक उपभोग या मालगोदाम के लिए आयात-पत्र दाखिल करना है जिसमें माल, मूल्‍य, मात्रा, छूट अधिसूचना, सीमा-शुल्‍क टैरिफ शीर्षक आदि के विवरण हों। आयात-पत्र पोत / विमान के प्रत्‍याशित आगमन से 30 दिन पहले दाखिल किया जा सकता है।

मैनुअल प्रणाली में, आयातक को आयात-पत्र चार प्रतियों में फाइल करना होता है; सीमा-शुल्‍क विभाग के लिए मूल तथा दूसरी प्रति, आयातक के लिए तीसरी प्रति और विप्रेषण करने के लिए बैंक के लिए चौथी प्रति। आयात-पत्र के साथ निम्‍नलिखित दस्‍तावेज भी सामान्‍यत: आवश्‍यक होते हैं : (क) कमर्शियल इनवाएस एवं पैकिंग सूची, (ख) लदान-पत्र/ हवाई मार्ग बिल, (ग) संबंधित कानूनों के अंतर्गत अपेक्षित दस्‍तावेज, (घ) छूट अधिसूचना की किसी शर्त को संतुष्‍ट करने के लिए अपेक्षित दस्‍तावेज। ईडीआई सीमा-शुल्‍क स्‍टेशनों में आयातक या उसके सीमा-शुल्‍क ब्रोकर द्वारा एक ऑनलाइन घोषणा फाइल करनी होगी जिसके आधार पर सिस्‍टम द्वारा आयात-पत्र जनरेट किया जाता है।

सीमा-शुल्‍क स्‍टेशनों में आयातक को आयात का विनियमन करने वाली विभिन्‍न एजेंसियों (ड्रग्‍स नियंत्रण, पौधा / पशु संगरोध आदि) द्वारा अपेक्षित सभी दस्‍तावेज इलेक्‍ट्रॉनिक रूप में प्रस्‍तुत कर ऑनलाइन अनुमोदन प्राप्‍त होंगे। आयातक को हरेक विनियामक से अलग-अलग संपर्क करने की आवश्‍यकता नहीं है।

जोखिम प्रबंधन प्रणाली (आरएमएस) में अपेक्षित अनुसार आयातक या निर्यातक द्वारा फाइल की गई घोषणा का उचित अधिकारी द्वारा सत्‍यापन किया जाएगा, कुछ मामलों में, सीमा-शुल्‍क आयुक्‍त के अनुमोदन से भी सत्‍यापन किया जा सकता है। ऐसे मामलों में आयात-पत्र या तो निर्धारण की समीक्षा के लिए या आयातित माल की जांच के लिए या दोनों के लिए प्रस्‍तुत किया जा सकता है। यदि स्‍व-निर्धारण सही पाया जाता है तो शुल्‍क का पुनर्मूल्‍यांकन किया जाए। ऐसे मामलों में जहां कोई निषेध नहीं है, आयातक द्वारा फाइल की गई घोषणा के बिना सत्‍यापन के आयात-पत्र शुल्‍क, यदि कोई है, के भुगतान पर निर्धारण या जांच के बिना सीधे मंजूरी के लिए आगे बढ़ाये जाएंगे।

ऐसे मामलों में, जहां आयातक या निर्यातक शुल्‍क देयता का निर्धारण करने या किसी कारण से स्‍व–निर्धारण करने में असमर्थ है, सिवाय ऐसे मामलों में जहां धारा 46(1) के परंतुक के अंतर्गत आयातक द्वारा जांच के लिए अनुरोध किया गया है, सीमा-शुल्‍क अधिनियम, 1962 की धारा 18(ए) के अंतर्गत उसके मूल्‍यांकन के लिए उचित अधिकारी के पास अनुरोध किया जाएगा। इस स्‍थिति में, उचित अधिकारी को आयातक को अनंतिम रूप से निर्धारित शुल्‍क तथा निर्धारण के बाद अंतिम रूप से देय शुल्‍क के समतुल्‍य अंतर शुल्‍क के लिए प्रतिभूति, जो उपयुक्‍त समझी जाए, प्रस्‍तुत करने के लिए कहकर शुल्‍क के अनंतिम निर्धारण का आश्रय लेने का विकल्‍प है।

ऐसी स्‍थितियां हो सकती हैं जब सीमा-शुल्‍क विभाग के उचित अधिकारी को यह लगता है कि स्‍व-निर्धारण के सत्‍यापन के लिए परीक्षण / अतिरिक्‍त दस्‍तावेज / सूचना की आवश्‍यकता है और माल का तुरंत पुनर्मूल्‍यांकन नहीं किया जा सकता है, लेकिन आयातक / निर्यातक द्वारा अत्‍यावश्‍यक आधार पर उसकी निकासी चाहिए। ऐसे मामलों में भी, माल अंतर शुल्‍क राशि तथा अनंतिम निर्धारण के लिए बांड पर माल जारी किया जा सकता है।

आयातित माल के लिए सीमा-शुल्‍क मूल्‍यांकन नियम की प्रमुख विशेषताएं क्‍या हैं?

आयातित माल पर सीमा-शुल्‍क की दरें या तो विशिष्‍ट या यथामूल्‍य आधार पर या कभी – कभी विशिष्‍ट सह यथामूल्‍य आधार पर होती हैं। जब सीमा-शुल्‍क यथामूल्‍य दरों पर अर्थात् माल के मूल्‍य के आधार पर लगाया जाता है, सीमा-शुल्‍क अधिनियम, 1962 की धारा 14, जो आयात / निर्यात माल के मूल्‍यांकन के लिए आधार निर्धारित करता है और सीमा-शुल्‍क मूल्‍यांकन (आयातित माल के मूल्‍य का निर्धारण) नियम, 2007 (जिसे सामान्‍यत: सीमा-शुल्‍क मूल्‍यांकन नियम – सीवीआर कहा जाता है) लागू हो जाते हैं। ये विश्‍व वयापार संगठन में मूल्‍यांकन संबंधी करार पर आधारित हैं।

सीमा-शुल्‍क अधिनियम, 1962 की धारा 14(2) के अंतर्गत, केन्‍द्रीय उत्‍पाद एवं सीमा-शुल्‍क बोर्ड किसी मद के लिए मूल्‍य निर्धारित करने के लिए अधिकृत हैं। इसे ‘टैरिफ मूल्‍य’ कहा जाता है। यदि किसी माल के लिए टैरिफ मूल्‍य निर्धारित किए जाते हैं, उन पर यथामूल्‍य शुल्‍क की गणना ऐसे टैरिफ मूल्‍यों के संदर्भ में की जानी चाहिए। टैरिफ मूल्‍य वर्तमान में अपरिष्‍कृत पॉम ऑयल, आरबीडी पॉम ऑयल, अन्‍य पॉम ऑयल, अपरिष्‍कृत पामोलीन, आरबीडी पामोलीन, अन्‍य पामोलीन, अपरिष्‍कृत सोया तेल, पीतल स्‍क्रैप (सभी ग्रेड) तथा पॉपी सीड्सके आयात के संबंध में नियत किए गए हैं।

अन्‍य माल के लिए, आवेदक को प्रदत्‍त या देय मूल्‍य, क्‍या आयात सम्‍बद्ध पार्टी से है, क्‍या माल के उपयोग तथा वितरण पर कोई प्रतिबंध मूल्‍य को विकृत करता है तथा क्‍या कमीशन, दलाली, कंटेनर या पैकिंग की लागत, क्रेता द्वारा दी गई सहायता, इंजीनियरिंग, डेवलपिंग, आर्ट वर्क, डिजाइन कार्य, भारत से बाहर अन्‍यत्र बनाये गए प्‍लैन तथा स्‍केच की लागता, रॉयल्‍टी तथा लाइसेंस फीस, पुनर्बिक्री आय का वापसी प्रवाह, अग्रिम भुगतान, मालभाड़ा, बीमा, उतराई प्रभार या कोई अन्‍य भुगतान आदि, जो आयातित माल से सम्‍बद्ध है लेकिन मूल्‍य का हिस्‍सा नहीं है, के लिए कोई लोडिंग किया गया है, जैसे विवरण देते हुए मूल्‍य की एक घोषणा (जिसे सामान्‍यत: गैट घोषणा कहा जाता है) फाइल करनी होगी। सम्‍बद्ध पार्टी लेन-देनों के मामले में, माल अनंतिम मूल्‍यांकन पर जारी किया जा सकता है और आयातक को विशेष मूल्‍यांकन शाखा द्वारा उपयुक्‍त जांच हेतु अतिरिक्‍त सूचना प्रस्‍तुत के लिए करने कहा जाता है। अन्‍य मामलों में, सीमा-शुल्‍क विभाग मूल्‍य घोषणा की जांच कर सकता है और यदि वह स्‍वीकार्य नहीं है तो घोषणा को नामंजूर कर सकता है और सीवीआर के नियम क्रमश: 4, 5, 7, 8, तथा 9 का प्रयोग करते हुए मूल्‍य का निर्धारण कर सकता है।

सीवीआर के नियम 4 के अंतर्गत सीमा-शुल्‍क विभाग समसामयिक आयात के आधार पर अर्थात् लगभग एक ही समय तथा स्‍थान पर और उसी वाणिज्‍यिक तथा मात्रा स्‍तरों पर मूल्‍य का निर्धारण करता है। यदि उस आधार पर मूल्‍य का निर्धारण नहीं किया जा सकता है तो सीमा-शुल्‍क विभाग सीवीआर नियम 5 के अंतर्गत अर्थात् लगभग उसी समय तथा स्‍थान पर और उसी वाणिज्‍यिक तथा मात्रा स्‍तरों पर आयातित एक ही तरह के माल के मूल्‍य के आधार पर मूल्‍य निर्धारित करता है, सीमा-शुल्‍क विभाग नियम 7 का इस्‍तेमाल कर सकता है और आयात-पूर्व खर्च घटाकर पुनर्बिक्री मूल्‍य के आधार पर मूल्‍य निर्धारित कर सकता है। इस पद्धति के असफल होने पर सीमा-शुल्‍क विभाग नियम 8, संगणित मूल्‍य का आश्रय लेता है जो माल के बनाने तथा सुपुर्दगी में शामिल लागत तथा खर्च पर आधारित है। अंतिम पद्धति, नियम 9 के अंतर्गत, अवशिष्‍ट पद्धति या फाल बैक पद्धति है जहां मूल्‍य का निर्धारण सीमा-शुल्‍क विभाग के पास उपलब्‍ध परिमाणनीय आंकड़ों तथा उद्देश्‍य के आधार पर किया जाता है।

पुराने पूंजीगत माल का आयात करते समय कौन-सी बातों पर ध्‍यान देना जरूरी है?

विदेश व्‍यापार नीति के पैरा 2।31 के अनुसार, पुराने पर्सनल कंप्‍यूटर / लैपटॉप, फोटो कॉपियर मशीन, डिजिटल बहु-कार्य प्रिंट तथा कॉपिंग मशीन, एयर कंडीशनर तथा डीजल जनरेटर सेट का आयात प्रतिबंधित है। अन्‍य सभी प्रयुक्‍त पूंजीगत माल लाइसेंस / प्राधिकरण के बिना आयात किए जा सकते हैं। तथापि निर्यात संवर्धन पूंजीगत माल योजना के अंतर्गत उनके आयात की अनुमति नहीं है।

प्रयुक्‍त पूंजीगत माल के मूल्‍यांकन के प्रयोजनार्थ, केन्‍द्रीय उत्‍पाद एवं सीमा-शुल्‍क बोर्ड (सीबीईसी) ने कुछ दिशानिर्देश(परिपत्र सं। 25/2015-कस्‍टम दिनांक 15।10।2015) जारी किए हैं। इस परिपत्र के अनुसार, पुरानी मशीनरी / प्रयुक्‍त पूंजीगत माल के समस्‍त आयात के साथ बिक्री के स्‍थान पर माल के जांच के आधार पर तैयार की गई विदेशी चार्टर्ड इंजीनियर या उसके समतुल्‍य द्वारा जारी निरीक्षण / मूल्‍यांकन रिपोर्ट होनी चाहिए। चार्टर्ड इंजीनियर या उसके समतुल्‍य की रिपोर्ट उस परिपत्र के साथ संलग्‍न फॉर्म ‘ए’ के अनुसार होनी चाहिए। यदि आयातक माल के निरीक्षण / मूल्‍यांकन की विदेशी रिपोर्ट प्राप्‍त करने में असफल रहता है, तो उसे एचबीपी 2015-20 के परिशिष्‍ट 2-I के अंतर्गत डीजीएफटी द्वारा अधिसूचित रूप में भारत में किसी एजेंसी से माल का निरीक्षण कराना चाहिए। सीमा-शुल्‍क स्‍टेशनों पर जहां डीजीएफटी द्वारा अधिसूचित एजेंसियां नहीं है, आयातक स्‍थानीय रूप से सूचीबद्ध चार्टर्ड इंजीनियरों की सेवाएं प्राप्‍त करना जारी रख सकते हैं। ऐसे मामलों में जहां रिपोर्ट डीजीएफटी द्वारा भारत में अधिसूचित एजेंसियों या कस्‍टम हाउसों द्वारा सूचीबद्ध चार्टर्ड इंजीनियरों द्वारा तैयार की जानी है, वह उक्‍त परिपत्र के साथ संलग्‍न फॉर्म ‘बी’ में होना चाहिए।

आयातक द्वारा घोषित मूल्‍य की जांच चार्टर्ड इंजीनियर की रिपोर्ट के संबंध में की जानी चाहिए। इसी प्रकार, परिपत्र सं।493/124/86- कस्‍टम IV दिनांक 19।11।1987 तथा 4।1।1988 के निबंधनों के अनुसार निर्धारित माल के मूल्‍यह्रासित मूल्‍य के संदर्भ में घोषित मूल्‍य की जांच की जाएगी। यदि ऐसी तुलना माल के घोषित मूल्‍य के बारे में कोई संदेह उत्‍पन्‍न नहीं करती है तो घोषित मूल्‍य स्‍वीकार कर लिया जाए। यदि नहीं तो उपयुक्‍त अधिकारी घोषित मूल्‍य को उचित सिद्ध करते हुए आयातक से स्‍पष्‍टीकरण मांगेगा, आयातक द्वारा प्रयुक्‍त साक्ष्‍यों का मूल्‍यांकन करेगा और मूल्‍यह्रास, री-फर्बिशमेंट या रीकंडीशनिंग (यदि कोई है) जैसे कारकों तथा माल की दशा पर सम्‍यक् विचार करने के बाद यह निर्धारित करेगा कि क्‍या सीमा-शुल्‍क मूल्‍यांकन नियम, 2007 के नियम 4 से 9 के निबंधनों के अनुसार माल के मूल्‍य का निर्धारण करने के लिए घोषित ट्रांजैक्‍शन मूल्‍य या आय को स्‍वीकार किया जाए।

सीबीईसी परिपत्र सं।493/124/86-कस्‍टम IV दिनांक 19।11।1987 में 70% की समग्र सीमा के अधीन मूल्‍यह्रास का निम्‍नलिखित मान निर्धारित किया गया है:

क्रं।सं। अवधि मूल्यह्रास दर
(i) (i) पहले वर्ष के दौरान प्रत्‍येक तिमाही के लिए 4%
(ii) (ii) दूसरे वर्ष के दौरान प्रत्‍येक तिमाही के लिए 3%
(iii) तीसरे वर्ष के दौरान प्रत्‍येक तिमाही के लिए 2.5%
(iv) चौथे वर्ष के दौरान प्रत्‍येक तिमाही के लिए 2%

मूल्‍यह्रास नई मशीनरी की मूल क्रय कीमत या कारों के लिए विश्‍व कार कैटलॉग कीमत पर सीधी रेखा पद्धति पर लगाया जाना चाहिए। री-कंडीशनिंग, यदि कोई है, की लागत जोड़ी जानी चाहिए। तिमाही के भाग के लिए उपयोग पर पूर्ण मूल्‍यह्रास की अनुमति है।

निर्यातित माल के पुन: आयात का प्रबंध कैसे किया जाए?

निर्यातित माल के पुन: आयात विदेश व्‍यापार (कतिपय मामलों में नियमों की प्रयोज्‍यता से छूट) नियम, 1993 के बचत खंड के अंतर्गत शामित है और इस प्रकार लाइसेंस / प्राधिकरण के बिना अनुमत है।

सीमा-शुल्‍क अधिनियम, 1962 की धारा 22 के अनुसार, “यदि माल भारत से निर्यात के बाद भारत में आयात किया जाता है, ऐसा माल शुल्‍क के लिए दायी होगा और उन सभी शर्तों तथा प्रतिबंधों, यदि कोई हों, के अधीन होगा जिसके लिए समान प्रकार तथा मूल्‍य के माल उसके आयात पर दायी या अधीन हैं।” इसका अर्थ यह है कि ऐसे माल पर पूरा शुल्‍क लगेगा। तथापि, पुन: आयात को शामिल करते हुए कुछ छूट अधिसूचनाएं हैं। पुन: आयात के सभी मामलों में, सीमा-शुल्‍क विभाग अभिन्‍न्‍ता के बारे में संतुष्‍ट हो कि वे वही हैं जो निर्यात किए गए थे।

दिनांक 14।11।1995की अधिसूचना 158/95 मरम्‍मत, रीकंडीशनिंग, पुन: प्रसंस्‍करण, परिष्‍करण, पुनर्निर्माण, इसी प्रकार की कोई अन्‍य प्रक्रिया करने तथा पुन: आयात की तारीख से 6 महीने, जो सीमा-शुल्‍क आयुक्‍त की अनुमति से छ: महीने की अवधि के लिए और बढ़ायी जा सकती है, की अवधि के भीतर पुन: निर्यात के प्रयोजनार्थ निर्यातित माल के पुन: आयात पर विचार करती है। इस प्रयोजन के लिए, पुन: आयात के समय सीमा-शुल्‍क विभाग को एक बांड प्रस्‍तुत करना होगा जिसे उक्‍त किसी भी प्रक्रिया को पूरा करने के बाद पुन: निर्यात पर उन्‍मोचित किया जाएगा। मरम्‍मत तथा रीकंडीशनिंग के लिए, पुन: आयात निर्यात के तीन वर्ष के भीतर होना चाहिए। पुन: प्रसंस्‍करण, परिष्‍करण, पुनर्निर्माण, इसी प्रकार की अन्‍य प्रक्रिया पूरा करनेके लिए पुन: आयात निर्यात के एक वर्ष के भीतर हो जाना चाहिए। इसके अलावा, ये प्रक्रियाएं केन्‍द्रीय उत्‍पाद शुल्‍क नियम, 1944 के नियम 173 एमएम के अंतर्गत तथा सीमा-शुल्‍क अधिनियम, 1962 की धारा 65 के प्रावधानों के अंतर्गत सीमा-शुल्‍क बांड में निर्धारित प्रक्रियाओं का अनुसरण करते हुए केन्‍द्रीय उत्‍पाद शुल्‍क नियंत्रण के अंतर्गत किसी फैक्‍टरी में निष्‍पादित की जानी चाहिए।

दिनांक 16।12।1995 की अधिसूचना 94/96-कस्‍टम का सार यह है कि निर्यात के समय उठाया गया कोई भी लाभ अभ्‍यर्पित किया जाना चाहिए। इस प्रकार, यदि निर्यात के समय शुल्‍क वापसी या उत्‍पाद शुल्‍क (राज्‍य या केन्‍द्र) छूट का लाभ उठाया गया था तो उसे वापस किया जाना चाहिए। यदि निर्यात के समय कोई उत्‍पाद शुल्‍क अदा नहीं किया गया था तो उसे पुन: आयात के समय अदा किया जाना चाहिए। यदि माल अग्रिम प्राधिकरण या ईपीसीजी प्राधिकरण के विरुद्ध दायित्‍व के उन्‍मोचन में निर्यात किए गए थे तो प्रविष्‍टि को डी-लॉग किया जाना चाहिए और डीईईसी लदान-पत्र को मुक्‍त लदान-पत्र में परिवर्तित किया जाना चाहिए और इसी प्रकार।

अधिसूचना 94/96 के अंतर्गत , यदि माल मरम्‍मत या पुन: आयात के लिए विदेश नहीं भेजा जाता है, पुन: आयात पर देय शुल्‍क मरम्‍मत की लागत (चाहे उपगत हो या न हो) + आने-जाने के माल-भाड़े तथा बीमा लागत पर शुल्‍क लगेगा। अधिसूचना 94/96 किसी निर्यात प्रोत्‍साहन का लाभ उठाये बिना निर्यात किए गए अन्‍य माल को पूर्णत: छूट प्रदान करती है। इस अधिसूचना में कुछ शर्तें हैं जिन्‍हें ध्‍यानपूर्वक नोट किया जाना चाहिए।

उपर्युक्‍त के अलावा, इलेक्‍ट्रोप्‍लेटिंग, परियोजनाओं के निष्‍पादन आदि तथा कुछ विविध प्रयोजनों के लिए विदेश भेजे गए माल के पुन: आयात को शामिल करते हुए छूट अधिसूचनाएं भी हैं।

बंधित मालगोदाम किसे कहते हैं? वहां किस नियमावली का अनुसरण करना होता है?

तीन प्रकार के बंधित मालगोदाम होते हैं जहां आयातित माल किसी शुल्‍क के भुगतान के बिना रखे जा सकते हैं। ये हैं –

  • सीमा-शुल्‍क अधिनियम, 1962 की धारा 58ए के अंतर्गत लाइसेंस प्राप्‍त विशेष मालगोदाम, जहां अधिसूचित संवेदनशील माल जमा किए जाते हैं।
  • सीमा-शुल्‍क अधिनियम, 1962 की धारा 58 के अंतर्गत लाइसेंस प्राप्‍त निजी मालगोदाम जहां लाइसेंसग्राही द्वारा या उसकी ओर से आयात किए गए असंवेदनशील माल जमा किए जा सकते हैं।
  • सीमा-शुल्‍क अधिनियम, 1962 की धारा 57 के अंतर्गत लाइसेंस प्राप्‍त सार्वजनिक मालगोदाम, जहां किसी भी व्‍यक्‍ति द्वारा आयातित असंवेदनशील माल जमा किए जा सकते हैं।

लाइसेंसिंग शर्तें शोधक्षमता प्रमाणपत्र, पर्यवेक्षण प्रभार, कस्‍टम लॉक आदि के बारे में अलग-अलग शर्तों के सिवाय कमोबेश समान हैं। आयातकों को बंधित मालगोदाम में माल जमा करने से पूर्व शुल्‍क की तिगुनी राशि के लिए बांड देना होगा। माल बंधित मालगोदाम में एक वर्ष की अवधि के लिए रखे जा सकते हैं। इस अवधि को सीमा-शुल्‍क आयुक्‍त द्वारा एक वर्ष की अतिरिक्‍त अवधि के लिए बढ़ाया जा सकता है। आंतरिक उपभोग के लिए निकालते समय शुल्‍क अदा करना होगा। नब्‍बे दिन की ब्‍याज-मुक्‍त अवधि के बाद अधिसूचित दरों पर ब्‍याज देय होगा।

संवदेशील माल में सोना, चांदी, अन्‍य बहुमूल्‍य धातुएं तथा अर्द्ध-बहुमूल्‍य धातुएं तथा उनसे निर्मित वस्‍तुएं; सीमा-शुल्‍क क्षेत्र में शुल्‍क मुक्‍त दुकानों को आपूर्ति, पोत या विमान को भंडार के रूप में आपूर्ति तथा विदेशी विशेषाधिकार प्राप्‍त व्‍यक्‍ति को आपूर्ति के प्रयोजनार्थ मालगोदाम में रखे गए माल शामिल हैं। विशेष मालगोदाम सीमा-शुल्‍क विभाग के भौतिक नियंत्रण में होंगे। मालगोदाम के प्रभारी बांड अधिकारियों की अनुमति तथा उनकी अनुपस्‍थिति के सिवाय संवदेनशील माल को विशेष मालगोदाम में लाने या वहां से निकालने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

अन्‍य मालगोदामों के मामले में, आयातित माल के प्रवेश के लिए अनुमति आवश्‍यक नहीं है और निर्यात माल निकालते समय को छोड़कर सीमा-शुल्‍क अधिकारी की उपस्‍थिति आवश्‍यक नहीं है। पोर्ट से मालगोदाम या एक मालगोदाम से दूसरे मालगोदाम में या निर्यात के लिए मालगोदाम से माल की आवा-जाही बोतल मुहरबंद या संख्‍यांकित एक-बारीय लॉक के अंतर्गत होनी चाहिए। विनिर्मित वस्‍तु बंधित मालगोदाम में लायी जा सकती है।

सभी मामलों में, माल के भंडारण तथा संचालन के लिए आवश्‍यक इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर होना चाहिए। माल की प्राप्‍ति, भंडारण, परिचालन तथा निकासी का हिसाब रखने के लिए कंप्‍यूटरीकृत प्रणाली होनी चाहिए और पर्याप्‍त कार्मिक नियुक्‍त होने चाहिए। माल गोदामपाल को सभी दस्‍तावेज इलेक्‍ट्रॉनिक रूप में फाइल करने के लिए डिजिटल हस्‍ताक्षर का प्रयोग करना चाहिए। उचित रिकॉर्ड रखा जाना चाहिए और आवधिक विवरणियां प्रस्‍तुत की जानी चाहिएं।

केन्‍द्रीय उत्‍पाद एवं सीमा-शुल्‍क बोर्ड ने यह स्‍पष्‍ट किया है कि सीमा-शुल्‍क क्षेत्र में स्‍थित शुल्‍क-मुक्‍त दुकान (डीएफएस) को मालगोदाम नहीं माना जाना चाहिए। यह ऐसे माल के लिए एक बिक्री बिन्‍दु है जो भारत में आने वाले या भारत से प्रस्‍थान करने वाले अंतरराष्ट्रीय यात्रियों को बिक्री के लिए सीमा-शुल्‍क क्षेत्र में लाए जाने के लिए मालगोदाम से निकाले जाते हैं। डीएफएस ऑपरेटर, जो शुल्‍क–मुक्‍त शॉपिंग क्षेत्र में स्‍टॉक की प्रतिपूर्ति करने के लिए स्‍टेजिंग क्षेत्र के रूप में कार्य करने के लिए शहरों में बड़े मालगोदामों में तथा/या हवाई-अड्डों के अहातों में तथा के आस-पास छोटे मालगोदामों में माल भंडारित करते हैं, उन मालगोदामों के लिए बंधित मालगोदाम के रूप में लाइसेंस प्राप्‍त कर सकते हैं।

कस्‍टम द्वारा माल रोक दिए जाने की स्‍थिति से कैसे निपटा जाए?

स्‍व-निर्धारण की शुरुआत हो जाने से, अधिकांश आयातित पारेषण आयातक की घोषणा के आधार पर निकल जाते हैं। जब जोखिम प्रबंधन प्रणाली कस्‍टम्‍स द्वारा मूल्‍य-निर्धारण के लिए कोई लदान-पत्र सिलेक्‍ट करती है या जब अपने स्‍वयं की जानकारी के आधार पर सीमा-शुल्‍क विभाग किसी लदान-पत्र की जांच करने का निर्णय लेता है, तब भी माल क्‍लियर हो जाते हैं, जब तक कि कानूनी प्रावधानों का अपालन ध्‍यान में नहीं आता है।

ऐसे अवसर भी होते हैं जब माल मुख्‍यत: वर्गीकरण या मूल्‍यांकन विवादों के कारण रोक दिए जाते हैं। ऐसे मामलों में, यह बेहतर होगा कि अंतर शुल्‍क राशि के लिए बांड प्रस्‍तुत किया जाए, अनंतिम मूल्‍यांकन के अंतर्गत माल निकाला जाए और बाद में तर्क-वितर्क किए जाएं। ऐसे भी अवसर होते हैं जब सीमा-शुल्‍क विभाग परीक्षण / जांच के लिए नमूने भेजना चाहता है। ऐसे मामलों में भी, बांड प्रस्‍तुत किया जा सकता है और अनंतिम मूल्‍यांकन पर माल निकलवाया जा सकता है।

जब रोक इस आधार पर है कि माल का आयात प्रतिबंधित है या कुछ शर्तों को पूरा करने के अधीन है और आयातक शर्तों (जैसे परमिट या लाइसेंस प्राप्‍त करना) को शीघ्र पूरा करने की प्रक्रिया में है, वह सीमा-शुल्‍क अधिनियम, 1962 की धारा 49 के अंतर्गत सार्वजनिक बंधित मालगोदाम में माल जमा करने की अनुमति प्राप्‍त कर सकता है। यदि आयातक शुल्‍क छूट का दावा करना चाहता है जो कुछ शर्तों (अर्थात् प्रमाणपत्र या प्राधिकरण प्राप्‍त करना) की पूर्ति के अधीन मंजूर की जा सकती है और वह मालगोदाम में रखने के लिए आयात-पत्र दाखिल कर सकता है, बंधित मालगोदाम में माल जमा कर सकता है और छूट की मंजूरी हेतु अपेक्षाओं का पालन करने की स्‍थिति में होने पर वह माल निकलवा सकता है।

ऐसी स्‍थितियां हो सकती हैं जहां आयातक इस बात से व्‍यथित है कि माल गलत ढंग से रोका गया है। ऐसे मामलों में, उसे वरिष्‍ठ अधिकारियों से मिलना चाहिए। मुख्‍य सीमा-शुल्‍क आयुक्‍त / सीमा-शुल्‍क आयुक्‍त से सभी कार्यदिवसों में निर्दिष्‍ट समय के दौरान कोई भी शिकायत रखने वाला व्‍यक्‍ति पहले से समय लिये बिना उससे मुलाकात करने के लिए स्‍वतंत्र है। इसके अलावा, हरेक आयुक्‍तालय में एक पदनामित लोक शिकायत अधिकारी होता है। इन अधिकारियों के नाम तथा फोन नंबर सार्वजनिक रूप में उपलब्‍ध रहते हैं। शिकायत के निवारण के लिए उन्‍हें संपर्क किया जा सकता है।

मुख्‍य / प्रधान सीमा-शुल्‍क आयुक्‍त, व्‍यापार तथा उद्योग और कस्‍टम हाउस एजेंटों के प्रतिनिधियों, अभिरक्षकों, बैंकों, निर्यात संवर्धन एजेंसियों तथा वाणिज्‍य मंडलों के प्रतिनिधियों , भारतीय खाद्य सुरक्षा मानक प्राधिकरण / पोर्ट स्‍वास्‍थ्‍य अधिकारी, पौध / पशु संगरोध प्राधिकारी, भारतीय औषध नियंत्रक, टेक्‍सटाइल समिति के सदस्‍यों आदि से युक्‍त कई समितियां जैसे लोक शिकायत समिति, निगरानी समिति और स्‍थल सीमा-शुल्‍क स्‍टेशनों तथा अंतर्देशीय कंटेनर डिपो के लिए सीमा-शुल्‍क मंजूरी सुगमीकरण समिति (सीसीएफसी) कई सीमा-शुल्‍क आयुक्‍तालयों में गठित की गई हैं। ये समितियां प्रक्रियात्‍मक मुद्दों या निर्यात / आयात के कस्‍टम क्‍लियरेंस में आने वाली समस्‍याओं या विभिन्‍न प्रोत्‍साहनों की मंजूरी में आने वाली समस्‍याओं को देखने के लिए नियमित रूप से बैठकें करती हैं। व्‍यापार तथा उद्योग से प्राप्‍त फीडबैक का इस्‍तेमाल प्रक्रियाओं की आवश्‍यक समीक्षा तथा आयातकों / निर्यातकों की कठिनाइयों को दूर करने हेतु उपाय करने के लिए किया जाता है तथा बैठकों के कार्यवृत्‍त वेबसाईट पर रखे जाते हैं। आयातक को अपनी समस्‍याओं को प्रस्‍तुत करने के लिए इन मंचों का इस्‍तेमाल करना चाहिए। कभी – कभी आयातक न्‍यायालय के दरवाजे भी खटखटाते हैं और उपयुक्‍त राहत की मांग करते हैं।

किसी मद के निर्यात पर लगे प्रतिबंध का पता कैसे चल सकता है?

वाणिज्‍य मंत्रालय ने निर्यात तथा आयात मदों के वर्गीकरण के लिए भारतीय व्‍यापार वर्गीकरण (एच एस प्रणाली) अधिसूचित किया है, जिसे आईटीसी (एचएस) के नाम से जाना जाता है। आईटीसी (एचएस) की अनुसूची– 2 में निर्यात नीति दी गयी है। इसमें 2 तालिकाएं हैं – तालिका ‘ए’ तथा तालिका ‘बी’। तालिका ‘ए’ ऐसी मदों के लिए नीति प्रस्‍तुत करती है जो आईटीसी (एचएस) की अनुसूची -1 के कई अध्‍यायों या शीर्षकों या उप शीर्षकों के अंतर्गत आ सकती हैं। तालिका ‘बी’ आईटीसी (एचएस) की अनुसूची–1 के विशिष्‍ट अध्‍याय या शीर्षकों या उप शीर्षकों पर नीति प्रस्‍तुत करती है। तालिका ‘ए’ तथा ‘बी’ में सूचीबद्ध माल से भिन्‍न सभी माल मुक्‍त रूप से यानि किसी शर्त के बिना निर्यात किए जा सकते हैं। अनुसूची – 2 तथा इसके परिशिष्‍ट में निर्यात लाइसेंसिंग नीति विदेश व्‍यापार (विकास एवं विनियम) अधिनियम, 1992 के अंतर्गत सार्वजनिक सूचना या अधिसूचना के जरिए नियंत्रण को निवारित नहीं करता है।

तालिका ‘ए’ में 8 प्रविष्‍टियां हैं। इनमें आईटीसी (एचएस) की अनुसूची 2 के परिशिष्‍ट 3 में यथा निर्दिष्‍ट विशेष रसायन, ऑर्गेनिज्‍म, सामग्री, उपकरण एवं प्रौद्योगिकी (एससीआइएमईटी) माल; विदेश व्‍यापार महा निदेशक द्वारा निर्दिष्‍ट मिलिटरी स्‍टोर्स तथा जंगली जानवर, पशु उत्‍पाद तथा डेरिवेटिव सहित उनसे निर्मित वस्‍तुएं महत्‍वपूर्ण हैं।एससीओएमईटी सूची में न शामिल मदों का निर्यात भी भारी विनाश के हथियार और उनकी वितरण प्रणाली (अधिमान्‍य कार्यकलापों का निषेध) अधिनियम, 2005 के प्रावधानों के अंतर्गत विनियमित होगा। पेलिट, डनिज, क्रेटिंग, पैकिंग ब्‍लॉक, ड्रम, केस लोड बोर्ड, पेलिट कॉलर्स तथा स्‍किड्स आदि जैसे वुड पैकेजिंग सामग्री का प्रयोग करते हुए पौधा तथा पौध उत्‍पादों सहित माल के निर्यात की अनुमति पादपस्‍वच्‍छता उपायों हेतु अंतरराष्ट्रीय मानदंड सं. 15 (आईएसपीएम 15) के अनुपालन के अधीन दी जाएगी।

तालिका ‘बी’ आईटीसी (एचएस) की अनुसूची – 1 के कतिपय अध्‍यायों, शीर्षकों / उप – शीर्षकों के अंतर्गत शामिल मदों को सूचीबद्ध करती है। नीति हरेक प्रविष्‍टि के सामने उल्‍लिखित है। कुछ मदें ‘निषिद्ध’ हैं अर्थात्‍ उन्‍हें निर्यात करने की अनुमति नहीं है। कुछ मदें ‘प्रतिबंधित’ हैं अर्थात उनके निर्यात की अनुमति लाइसेंस के अंतर्गत दी जा सकती है। कुछ मदें सिर्फ राज्‍य व्‍यापार उद्यमों (अर्थात् स्‍टेट ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन लि।) द्वारा ही निर्यात की जा सकती हैं। तालिका ‘बी’ की अन्‍य सभी मदों का मुक्‍त रूप से निर्यात करने की अनुमति है, लेकिन यह निर्दिष्‍ट शर्तों जैसे निर्दिष्‍ट प्राधिकारियों से प्रमाणपत्र, कुछ प्राधिकारियों के पास रजिसट्रेशन, न्‍यूनतम निर्यात मूल्‍य, निर्दिष्‍ट कानूनों का पालन, गुणवत्‍ता प्रमाणन तथा इसी प्रकार अन्‍य शर्तों की पूर्ति के अधीन होगी।

सामान्‍यत: निर्यात के लिए कोई देश विशिष्‍ट प्रतिबंध नहीं होता है। तथापि, ईराक को शस्‍त्र तथा संबंधित सामग्री का निर्यात निषिद्ध है। ऐसी सभी मदों, सामग्री, उपकरणों, माल तथा प्रौद्योगिकी का प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष निर्यात निषिद्ध है जो कोरिया प्रजातांत्रिक जन गणराज्‍य के न्‍यूक्‍लियर सम्‍बद, बैलिस्‍टिक मिसाइल सम्‍बद्ध या व्‍यापक विध्‍वन्‍स के अन्‍य हथियारों के निर्माण में योगदान दे सकें। कोत-दि-वॉयर को अपरिष्‍कृत हीरे का निर्यात निषिद्ध है। अपरिष्‍कृत हीरे का निर्यात निषिद्ध है।

इसके अलावा, विदेश व्‍यापार महा निदेशक द्वारा जारी सार्वजनिक सूचना से विनियमित किसी मद का सार्वजनिक सूचना में अधिसूचित शर्तों के अधीन मुक्‍त रूप से निर्यात किया जा सकता है।

माल के निर्यात के लिए सीमा-शुल्‍क संबंधी प्रक्रियाएं कौन-सी हैं ?

निर्यात माल की निकासी (क्‍लियरेंस) के लिए निर्यातक या उसके एजेंट को लदान-पत्र दाखिल करने से पूर्व डीजीएफटी से एक आयातक – निर्यातक कोड (आईईसी) नंबर प्राप्‍त करना होगा। ईडीआई प्रणाली के अंतर्गत, आईईसी नंबर डीजीएफटी से सीमाशुल्‍क सिस्‍टम द्वारा ऑनलाइन प्राप्‍त होता है। निर्यातक को प्राधिकृत विदेशी मुद्राव्‍यापारी कोड (जिसके माध्‍यम से निर्यात आय प्राप्‍त होने की प्रत्‍याशा है) भी पंजीकृत कराना होगा तथा कोई शुल्‍क वापसी प्रोत्‍साहन राशि जमा करने के लिए नामित बैंक में एक चालू खाता खोलना होगा।

निर्यात संवर्धन योजना के अंतर्गत निर्यात करने के इच्‍छुक सभी निर्यातकों को सीमा-शुल्‍क स्‍टेशन में अपने लाइसेंस आदि का रजिस्‍ट्रेशन करवाना होगा। ऐसे रजिस्‍ट्रेशन के लिए मूल दस्‍तावेज आवश्‍यक होते हैं। सामान्‍यत: लदान-पत्र की प्रोसेसिंग के लिए ईडीएफ / एसडीएफ फॉर्म प्रस्‍तुत करना आवश्‍यक है जिसका इस्‍तेमाल निर्यात आय के संबंध में विदेशी मुद्रा प्रेषण की निगरानी करने के लिए किया जाता है। तथापि, कुछ ऐसे अपवाद हैं जब ईडीएफ फॉर्म आवश्‍यक नहीं होता है। इन अपवादों में 25,000 यूएस डॉलर से अनधिक मूल्‍य के माल का निर्यात तथा 5 लाख रुपये तक मूल्‍य के उपहार का निर्यात शामिल है।

निर्यातकों या उनके सीमा-शुल्‍क ब्रोकरों को अनिवार्य घोषणा-पत्र तथा दस्‍तावेजों के साथ निर्यात किए जाने वाले माल के ब्‍यौरे देते हुए लदान-पत्र फाइल करना होगा। ईडीआई समर्थित सीमा-शुल्‍क स्‍टेशनों में कार्गो घोषणा-पत्र ऑनलाइन अपलोड किया जाता है और लदान-पत्र सिस्‍टम से जनरेट होता है। आयातक तथा निर्यातक सिर्फ सीमा-शुल्‍क विभाग के पास एकल बिन्‍दु पर अपने सीमा-शुल्‍क मंजूरी दस्‍तावेज इलेकट्रॉनिक रूप में प्रस्‍तुत करते हैं। साझेदार सरकारी एजेंसियों (पीजीए) जैसे पशु संगरोध, पौधा संगरोध, औषध नियंत्रक, भारतीय खाद्य सुरक्षा तथा मानक प्राधिकरण, टेक्‍सटाइल समिति आदि से अपेक्षित अनुमति, यदि कोई है, निर्यातक द्वारा इन एजेंसियों से अलग से संपर्क किए बिना ऑनलाइन प्राप्‍त होती है। यह सभी विनियामक एजेंसियों, लॉजिस्‍टिक्‍स सेवा प्रदाताओं तथा निर्यातकों द्वारा प्रयुक्‍त एक सामान्‍य, निर्बाध रूप से एकीकृत आईटी सिस्‍टम के माध्‍यम से संभव हो पाया है।

निर्यात के प्रयोजनार्थ लाये गए माल को निर्यातकों द्वारा दाखिल किए गए घोषणा-पत्रों के आधार पर गोदी में प्रवेश की अनुमति दी जाती है। फैक्‍टरी में भरे गए कंटेनरों को पोर्ट में सीधे प्रवेश की अनुमति देने के लिए भी अनुदेश जारी किए गए हैं। अभिरक्षक संबंधित दस्‍तावेज पर वस्‍तुत: प्राप्‍त माल की मात्रा दर्ज करता है। अगला कदम माल की जांच है। स्‍व-मूल्‍यांकन की शुरुआत हो जाने से जोखिम प्रबंधन प्रणाली सीमा-शुल्‍क द्वारा मूल्‍यांकन के लिए लदान-पत्र का चयन करती है। सीबीईसी ने प्रोत्‍साहन की मात्रा, निर्यात माल का मूल्‍य, गंतव्‍य स्‍थान का देश आदि को ध्‍यान में रखते हुए निर्यात पारेषण की जांच के लिए मानदंड निर्धारित किए हैं।

जांच के बार, सीमा-शुल्‍क विभाग ‘लेट एक्‍सपोर्ट ऑर्डर’ देता है। लेट एक्‍सपोर्ट ऑर्डर(एलईओ) की मंजूरी के बाद कार्गो का पैलिटाइजेशन किया जाता है। इस प्रकार, सीमा-शुल्‍क से पैलिटाइजेशन के लिए अलग से अनुमति प्राप्‍त करने की आवश्‍कता नहीं है। तथापि, विमान / पोत पर लदाई के लिए अनुमति प्राप्‍त की जाती रहेगी।

मूल्‍यांकनकर्ता द्वारा ईडीआई सिस्‍टम पर ‘लेट एक्‍सपोर्ट ऑर्डर’ दिए जाने के बाद लदान-पत्र दो प्रतियों में जनरेट किया जाता है। तथापि लदान-पत्रकी ईपी प्रति निर्यात सामान्‍य मालसूची के प्रस्‍तुतीकरण के बाद ही जनरेट होती है।

मूल्‍यांकनकर्ता एसडीएफ की मूल तथा दूसरी प्रति पर मुहर के साथ हस्‍ताक्षर करता है और उसके बाद मूल घोषणा-पत्रों के साथ लदान-पत्र की सीमा-शुल्‍क प्रति तथा एसडीएफ की मूल प्रति निर्यात विभाग को अग्रेषित करता है। एसडीएफ की निर्यातक प्रति तथा दूसरी प्रति निर्यातक या उसके एजेंट को वापस की जाती है।

वस्तुओं के निर्यात के लिए सीमा शुल्क निर्धारण नियमों की बुनियादी विशेषताएं क्या हैं?

सीमा शुल्क निर्धारण (निर्यात माल का मूल्य निर्धारण) नियम, 2007 के नियम 3, 4, 5 और 6 में निर्यात माल के मूल्य निर्धारण के चार तरीके बताए गए हैं।

नियम 3, जो नियम 8 के अध्यधीन है, में कहा गया है कि निर्यात माल का मूल्य वही होगा, जो ट्रांजैक्शन मूल्य होगा। ट्रांजैक्शन मूल्य वह मूल्य है जो भारत से निर्यात के लिए बेचे जाते समय देय है। और निर्यात स्थल पर, जहां माल के खरीदार और विक्रेता संबंधित नहीं हैं और बिक्री के लिए केवल मूल्य का ही ध्यान रखा जाता है। इस प्रकार निर्यात की जाने वाली वस्तुओं के मूल्य निर्धारण के लिए ट्रांजैक्शन मूल्य ही प्राथमिक आधार है। जहां ट्रांजैक्शन मूल्य स्वीकार नहीं किया जाता, वहां निर्यात की जाने वाली वस्तुओं का मूल्य निर्धारण नियम 4 से नियम 6 के अनुरूप किया जाएगा।

नियम 3 कहता है कि निर्यात माल का ट्रांजैक्शन मूल्य तब भी स्वीकार्य है, जब खरीदार और विक्रेता संबंधित हों, बशर्ते कि यह संबंध माल के मूल्य को प्रभावित करने वाला न हो। जहां कहीं यह संबंध मूल्य को प्रभावित करने वाला पाया जाता है, वहां निर्यात माल का मूल्य, नियम 4 से 6 में बताए अनुसार निर्धारित किया जाना चाहिए। ‘संबंधी’ कहलाए जाने वाले व्यक्तियों का विवरण मूल्य निर्धारण नियमों के नियम 2 (2) में दिया गया है।

नियम 4 में निर्यात मूल्य का निर्धारण तुलना द्वारा किया जाना बताया गया है। इसके अनुसार, निर्यात माल का मूल्य एक ही तरह के और गुणवत्ता वाले माल के ट्रांजैक्शन मूल्य पर आधारित होगा अथवा आयात करने वाले उसी देश में किन्हीं अन्य खरीदारों अथवा उनकी अनुपस्थिति में नियत राशि में ही आयात करने वाले किसी अन्य देश में माल के ट्रांजैक्शन मूल्य पर आधारित होगा।

नियम 5 गणना मूल्य पद्धति बताता है। यानी इसमें मूल्य का निर्धारण गणना पर आधारित होता है, जिसमें उत्पादन, विनिर्माण अथवा निर्यात माल के प्रसंस्करण की लागत, और डिजाइन या ब्रांड के लिए खर्च, यदि कोई प्रभार है तो वह प्रभार और लाभ की राशि शामिल होती है।

नियम 6 वह पद्धति है, जिसमें मूल्य निर्धारण उचित साधनों का इस्तेमाल करते हुए सिद्धांतों के अनुरूप और नियमों के सामान्य प्रावधानों के अनुसार किया जाता है, बशर्ते कि निर्यात माल का मूल्य निर्धारण केवल निर्यात माल के स्थानीय बाजार मूल्य के आधार पर ही न किया जाए।

नियम 7 के अनुसार निर्यातक द्वारा निर्यात मूल्य के संबंध में एक घोषणा दी जानी जरूरी है।

नियम 8 के अंतर्गत सक्षम अधिकारी को यह अधिकार है कि वह घोषित मूल्य की सत्यता के संबंध में होने पर निर्यातक से इसके संबंध में उचित दस्तावेज अथवा अन्य कोई प्रमाण जैसी दूसरी जानकारी प्रस्तुत करने को कह सकता है। और इस प्रकार की जानकारी मिलने के बाद या ऐसे निर्यातक द्वारा कोई उत्तर न मिलने पर भी सक्षम अधिकारी घोषित को मूल्य की सत्यता के संबंध में संदेह है, तो वह घोषित मूल्य को खारिज कर सकता है और फिर नियम 4 से 6 तक बताए अनुसार मूल्य निर्धारण कर सकता है। इस नियम की ‘व्याख्या’ प्राधिकारी को घोषित मूल्य को खारिज करने के लिए स्पष्टता प्रदान करती है।

आयातित माल के पुनर्निर्यात पर दिया गया शुल्क वापस कैसे मिलेगा?

सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 74 में यह प्रावधान किया गया है कि यदि आयातक द्वारा आयातित माल को पुनर्निर्यात किया जाता है, जो कुछ निश्चित शर्तों के अध्यधीन है, तो आयात के समय लिए जाने वाले सीमा शुल्क की 98% तक की राशि वापस प्राप्त की जा सकती है। पुनः निर्यात, आयात किए जाने की तारीख से अधिकतम दो वर्ष की अवधि के भीतर किया जा सकता है (यह समुचित कारण देने पर बढ़ाई जा सकती है)। माल की पहचान पूर्व के आयात दस्तावेजों के आधार पर की जानी आवश्यक है और शुल्क का भुगतान निर्यात के समय सीमा शुल्क सहायक/उपायुक्त की संतुष्टि के अध्यधीन है। इसकी प्रक्रिया आयातित माल का पुनर्निर्यात (सीमा शुल्क की वापसी) नियम, 1995 में दी गई है।

यदि ऐसे माल को आयात के बाद इस्तेमाल किया गया है तो, सीमा शुल्क की वापसी निम्नलिखित अनुपात में की जाएगीः

क्र. अवधि घरेलू खपत के लिए क्लीयरेंस की तारीख से माल के निर्यात के लिए कस्टम्स कंट्रोल तक पहुंचने की तारीख के बीच की अवधि होगी ड्राबैक के रूप में दिए जाने वाले आयात शुल्क का प्रतिशत
(1) (2) (3)
1 अधिकतम 3 महीने 95%
2 3 से 6 महीने 85%
3 6 से 9 महीने 75%
4 4. 9 से 12 महीने 70%
5 12 से 15 महीने 65%
6 15 से 18 महीने 60%
7 18 माह से अधिक कुछ नहीं

इसके अतिरिक्त, वस्तुओं की कुछ विशिष्ट श्रेणियों पर दिए गए आयात शुल्क पर किसी तरह की शुल्क वापसी की अनुमति नहीं है। जैसे- परिधान, चाय के बक्से, सेंसर बोर्ड से पारित एक्सपोज्ड सिनेमैटोग्राफिक फिल्में, अनएक्सपोज्ड फोटोग्राफिक फिल्में, पेपर और प्लेट्स और एक्स रे फिल्में। व्यक्तिगत या निजी इस्तेमाल के लिए आयात किए गए मोटर वाहनों के संबंध में शुल्क वापसी की गणना, प्रत्येक तिमाही या उस तिमाही के दौरान किए गए इस्तेमाल के प्रतिशत को घटाकर की जाती है। यह अवधि अधिकतम चार वर्ष हो सकती है।

यदि आयातित माल में कोई डिफेक्ट मिलता है या आयातक और माल के आपूर्तिकर्ता के बीच स्पेसिफिकेशन पर सहमत अनुसार माल में कोई अन्य गड़बड़ पाई जाती है तो सीमा शुल्क अधिनियम, 1962 की धारा 26ए में आयात शुल्क के रिफंड का प्रावधान है। रिफंड को क्लेम करने की प्रमुख शर्तों में से एक यह भी है कि आयात के बाद माल पर कोई वर्क न किया गया हो या कोई मरम्मत न की गई हो या इस्तेमाल न किया गया हो। बशर्ते कि यह कार्य डिफेक्ट खोजने या स्पेसिफिकेशन पता लगाने के लिए न किया गया हो, तो रिफंड क्लेम किया जा सकता है। दूसरी शर्त यह है कि माल का निर्यात शुल्क वापसी का क्लेम किए बिना किया गया हो अथवा कस्टम्स में छोड़ दिया गया हो अथवा नष्ट कर दिया गया हो अथवा आयातित माल के घरेलू खपत के लिए सक्षम प्राधिकारी द्वारा क्लीयरेंस दिए जाने के 30 दिन के भीतर सक्षम प्राधिकारी की उपस्थिति में उस क्लेम को वाणिज्यिक रूप से मूल्यहीन करार दिया गया हो। 30 दिन की यह अवधि सीमा शुल्क आयुक्त के न्यायाधिकार में है, जो वाजिब कारण दिए जाने पर इसे बढ़ा सकते हैं। हालांकि खराब होने वाली वस्तुओं और उपयोग या भंडारण की अवधि खत्म हो जाने वाली वस्तुओं पर कोई रिफंड नहीं मिलेगा।

ये निर्यात वेयरहाउस क्या होते हैं और कैसे काम करते हैं?

निर्यात वेयरहाउस ऐसे स्थान होते हैं, जहां निर्यात किए जाने वाले माल को उत्पाद शुल्क चुकाए बिना विनिर्माता से खरीदा जा सकता है और यदि जरूरी हो तो पैकिंग, री-पैकिंग, लेबलिंग या री-लेबलिंग के बाद वेयरहाउस से निर्यात किया जा सकता है। इसकी संकल्पना इसलिए की गई थी ताकि विभिन्न विनिर्माताओं से निर्यात माल की खरीद को सुगम बनाया जा सके और विदेशी ग्राहकों की अपेक्षा के अनुरूप माल निर्यात किया जा सके।

टू स्टार एक्सपोर्ट हाउस का दर्जा प्राप्त निर्यातक, प्रतिष्ठित विदेशी डिपार्टमेंटल स्टोर और डीजीएफटी के साथ सहमति ज्ञापन करने वाले ऑटोमोबाइल विनिर्माता अहमदाबाद, बेंगलूरु, कोलकाता, चेन्नै, दिल्ली, हैदराबाद, जयपुर, कानपुर, लुधियाना, पुणे और मुंबई में निर्यात वेयरहाउस स्थापित कर सकते हैं।

जो निर्यातक इस सुविधा का लाभ उठाना चाहते हैं, उन्हें अपने वेयरहाउस को केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड में रजिस्टर कराना आवश्यक है। इसके साथ ही बोर्ड के अधिकारियों द्वारा निर्धारित किसी प्रतिभूति के साथ जनरल बॉन्ड प्रस्तुत करना भी जरूरी है। निर्यातक का एक बॉन्ड खाता होना चाहिए, जिसे किसी भी विनिर्माता की फैक्टरी से माल हटाए जाने पर डेबिट किया जाना चाहिए। इसके बाद निर्यातक को माल हटाने के लिए उत्पाद शुल्क का भुगतान किए बिना अपने न्यायाधिकार क्षेत्र में उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड से एक प्रमाणीकरण भी प्राप्त करना होता है। सुपरिंटेंडेंट सी-2 को सूचित करता है और इसे विनिर्माता को भेजता है, जो इसके बाद विनिर्मित माल को फॉर्म ए आर ई -3 के अंतर्गत निर्यात वेयरहाउस को भेज सकता है। वेयरहाउस में माल प्राप्त होने पर वेयरहाउस का उत्पाद एवं सीमा शुल्क प्रभारी अधिकारी ए आर ई-3 को प्रतिहस्ताक्षर करेगा और इसकी एक प्रति रेंज अधिकारी को भेजेगा, जिसके पास फैक्टरी हटाने का न्यायाधिकार क्षेत्र होगा। पैकिंग सामग्री भी इसी प्रक्रिया से खरीदी जा सकती है।

आवश्यक होने पर निर्यातक अपने विदेशी ग्राहकों की आवश्यकतानुसार एक या अधिक विनिर्माताओं से माल की पैकिंग, रीपैकिंग, लेबलिंग, रीलेबलिंग कराता है और फिर ए आर ई-1 के अंतर्गत निर्यात के लिए वेयरहाउस से माल हटाता है। निर्यातक को माल प्राप्ति, स्टोरेज और माल भेजने का समुचित रिकार्ड रखना चाहिए, ताकि ए आर ई-3 के अंतर्गत प्राप्त माल का मिलान ए आर ई-1 के अंतर्गत भेजे गए माल से किया जा सके।

निर्यातों के प्रभावी होने और कस्टम्स द्वारा विधिवत एंडोर्स किए हुए ए आर ई-1 की प्राप्ति के बाद, निर्यातक अपने बॉन्ड खाते में क्रेडिट ले सकता है। उसे प्रत्येक महीने में निर्यात किए गए माल की तारीख के साथ ए आर ई-1 की मूल प्रतियां, जो कस्टम्स प्राधिकारियों द्वारा प्रमाणित होनी चाहिए कि माल का निर्यात वास्तव में हुआ है और समाधान विवरण अर्थात ए आर ई-1 की सूची प्रस्तुत करना अनिवार्य है।

वेयरहाउस के प्रभारी सुपरिंटेंडेंट को ए आर ई-1 की सत्यापित प्रतियों को प्रमाणित करना होता है (निर्यातक को एक से अधिक प्रतियों की जरूरत होती है, क्योंकि एक ए आर ई-1 में ए आर ई-3 की कई वस्तुएं हो सकती हैं) और निर्यातक को देनी होती है, ताकि वह उस फैक्ट्री को दे सके, जिसका माल निर्यात किया जा रहा है और उन फैक्टरियों को भी सेनवैट क्रेडिट जैसे अन्य निर्यात लाभ मिल सकें।

वेयरहाउस वस्तुओं को शुल्क और ब्याज के भुगतान पर वेयरहाउस के प्रभारी अधिकारी की अनुमति से घरेलू खपत के लिए डाइवर्ट किया जा सकता है।

एक्सपोर्ट हाउस को दी जाने वाली मान्यताएं क्या हैं, कैसे दी जाती है और इसके लाभ क्या हैं?

एक्सपोर्ट हाउस के रूप में मान्यता प्रदान करने यानी एक्सपोर्ट हाउस का दर्जा देने का उद्देश्य देश के निर्यातों को बढ़ाना और निर्यातकों को कुछ विशेषाधिकार प्रदान करते हुए निर्यातों को सुगम बनाना है।

वस्तुओं, सेवाओं और प्रौद्योगिकी के वे सभी निर्यातक अपने-अपने निर्यात निष्पादन के आधार पर एक्सपोर्ट हाउस का दर्जा प्राप्त कर सकते हैं, जिनके पास निर्यात-आयात कोड (आईईसी) है। निर्यात निष्पादन की गणना मुक्त विदेशी मुद्रा विनिमय में निर्यात आय के एफओबी मूल्य के आधार पर की जाएगी। डीम्ड निर्यात के लिए, निर्यातों का एफओबी मूल्य सीबीईसी द्वारा अधिसूचित तथा प्रत्येक वित्तीय वर्ष में 1 अप्रैल को यथा लागू विनिमय दर पर भारतीय रुपए से यूएस डॉलर में परिवर्तित किया जाएगा। यह दर्जा हासिल करने के लिए, तीन में से कम से कम दो वर्षों में निर्यात निष्पादन आवश्यक है। किसी आवेदक को वर्तमान और पिछले दो वित्तीय वर्षों के दौरान उसके निर्यात निष्पादन के आधार पर निम्नलिखित अनुसार यह दर्जा दिया जा सकता हैः

दर्जे की श्रेणी निर्यात निष्पादन एफओबी (परिवर्तित) मूल्य (मिलियन यूएस डॉलर में)
एक सितारा एक्सपोर्ट हाउस 3
दो सितारा एक्सपोर्ट हाउस 25
तीन सितारा एक्सपोर्ट हाउस 100
चार सितारा एक्सपोर्ट हाउस 500
पांच सितारा एक्सपोर्ट हाउस 2000

एक सितारा एक्सपोर्ट हाउस का दर्जा प्रदान करने हेतु निर्यात निष्पादन की गणना के लिए आईईसी कोड धारक निर्यातक द्वारा निम्नलिखित श्रेणियों में निर्यात को दुहरा भारांक (डबल वेटेज) दिया जाता हैः

  • (i) सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास अधिनियम 2006 में परिभाषित अनुसार सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम।
  • (ii) आईएसओ / बीआईएस धारक विनिर्माण इकाइयां।
  • (iii) जम्मू-कश्मीर सहित पूर्वोत्तर के राज्यों में स्थित इकाइयां।
  • (iv) कृषि निर्यात क्षेत्रों में स्थित इकाइयां।

किसी शिपमेंट को उपर्युक्त में से किसी एक श्रेणी में एक बार ही दुहरा भारांक (डबल वेटेज) दिया जा सकता है।

एक्सपोर्ट हाउस का दर्जा प्राप्त निर्यातक निम्नलिखित अनुसार विशेषाधिकार के लिए पात्र होते हैं

  • (a) आयात और निर्यात, दोनों के लिए अथॉराइजेशन और कस्टम्स क्लीयरेंस स्व-घोषित आधार पर किया जाता है;
  • (b) इनपुट-आउटपुट मानदंड प्राथमिकता के आधार पर 60 दिन के भीतर मानदंड समिति द्वारा निर्धारित किए जाते हैं;
  • (c) एफटीपी के अंतर्गत योजनाओं के लिए बैंक गारंटी प्रस्तुत करने से छूट, जब तक कि एफटीपी अथवा एचबीपी में अन्यथा उल्लेख न किया गया हो;
  • (d) बैंक के जरिए दस्तावेजों के अनिवार्य निगोशिएशन से छूट। हालांकि बैंकिंग चैनलों के जरिए रेमिटैंस / रसीद प्राप्त की जाएंगी;
  • (e) दो सितारा और इससे ऊपर का दर्जा प्राप्त निर्यात गृहों को राजस्व विभाग के दिशानिर्देशों के अनुसार निर्यात वेयरहाउस स्थापित करने की अनुमति होगी;
  • (f) तीन सितारा और इससे ऊपर का दर्जा प्राप्त एक्सपोर्ट हाउस सीबीईसी के दिशानिर्देशों के अनुसार एक्रिडिटेड क्लाइंट्स प्रोग्राम (एसीपी) के लाभ के अधिकारी होंगे। (वेबसाइटः http://cbec.gov.in)
  • (g) एक्सपोर्ट हाउस का दर्जा प्राप्त निर्यातकों को संबंधित एजेंसियों द्वारा कंसाइन्मेंट हैंडल करने में प्राथमिकता मिलेगी।
  • (h) ऐसे विनिर्माता, जो (एक / दो / पांच सितारा) दर्जा प्राप्त हैं, अपने द्वारा विनिर्मित वस्तुओं को (अपने आईईएम/आईएल/एलओआई के अनुसार) स्व-प्रमाणित कर सकेंगे ताकि भारत में विनिर्मित उत्पादों को मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए), व्यापक आर्थिक सहयोग समझौतों (सीईसीए) और व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौतों (सीईपीए) जैसे विभिन्न व्यापार समझौतों के अंतर्गत प्राथमिकता मिल सके।
  • (i) ऐसे विनिर्माता निर्यातक, जिन्हें एक्सपोर्ट हाउस का दर्जा प्राप्त भी है, प्रक्रिया पुस्तिका (हैंड बुक ऑफ प्रोसिजर्स) के पैरा 2.0108 (डी) के अनुसार भारत में विनिर्मित वस्तुओं को स्व-प्रमाणित कर सकेंगे।
  • (j) एक्सपोर्ट हाउस का दर्जा प्राप्त निर्यातक, पिछले तीन लाइसेंसिंग वर्षों के दौरान सालाना 10 लाख रुपए या वार्षिक निर्यात आय का 2%, जो भी कम हो, मूल्य तक की मुक्त निर्यात योग्य वस्तुओं का निःशुल्क निर्यात कर सकेंगे, ताकि निर्यात को बढ़ावा दिया जा सके।

एमईआईएस योजना क्या है? ये काम कैसे करती है?

एमईआईएस यानी मर्केंडाइज एक्सपोर्ट्स फ्रॉम इंडिया स्कीम। इसका उद्देश्य भारत में उत्पादित / विनिर्मित वस्तुओं / उत्पादों के लिए बुनियादी ढांचागत अक्षमताओं और निर्यात लागत को कम करना है। विशेष रूप से उन वस्तुओं की निर्यात लागत, जिनका निर्यात अधिक होता है और जिनमें रोजगार की संभावनाएं अधिक हैं, ताकि निर्यात स्पर्धात्मकता को बढ़ाया जा सके। यह लाभ ड्यूटी क्रेडिट स्क्रिप के जरिए दिया जाता है।

आईटीसी (एचएस) कोड वाली अधिसूचित वस्तुओं / उत्पादों की प्रक्रिया पुस्तिका (हैंडबुक ऑफ प्रोसिजर्स) खंड 1 के परिशिष्ट 3बी में उल्लिखित अनुसार अधिसूचित बाजारों को किया गया निर्यात एईआईएस के अंतर्गत लाभ के लिए पात्र है। परिशिष्ट 3बी [आईटीसी (एचएस कोड वार)] में विभिन्न अधिसूचित उत्पादों पर मिलने वाले रिवार्ड्स की दर भी दी गई है। परिशिष्ट 3बी में उल्लिखित 7900 से अधिक मदें अब एमईआईएस के लिए पात्र हैं।

रिवार्ड की गणना, जब तक कि अन्यथा उल्लेख न किया गया हो, मुक्त विदेशी मुद्रा विनिमय में निर्यातों के एफओबी मूल्य अथवा मुक्त विदेशी मुद्रा विनिमय में शिपिंग बिलों में दिए गए निर्यातों के एफओबी मूल्य, इनमें से जो भी कम हो, के आधार पर की जाती है। परिशिष्ट 3सी में उल्लखित अनुसार, ई-कॉमर्स का इस्तेमाल करते हुए कुरियर अथवा विदेशी पोस्ट ऑफिस के जरिए वस्तुओं के निर्यात का एफओबी मूल्य 25000 रुपए प्रति कंसाइन्मेंट तक है, तो वह भी एमईआईएस के अंतर्गत रिवार्ड्स के लिए अधिकृत है। ई-कॉमर्स का इस्तेमाल करते हुए निर्यात का एफओबी मूल्य 25000 रुपए प्रति कंसाइन्मेंट से अधिक है तो एमईआईएस रिवार्ड केवल 25000 रुपए के एफओबी मूल्य तक ही मिलेगा। ऐसी वस्तुएं नई दिल्ली, मुंबई और चेन्नै में विदेशी पोस्ट ऑफिस के जरिए निर्यात की जा सकती हैं।

बहुत सी निर्यात श्रेणियां / खंड एमईआईएस के अंतर्गत रिवार्ड के लिए पात्र नहीं हैं। इनमें से कुछ वो वस्तुएं हैं जो आईटीसी (एचएस) में निर्यात नीति की अनुसूची-2 में निर्यात के लिए प्रतिबंधित हैं। दूध और दुग्ध उत्पाद, हर प्रकार की चीनी, क्रूड / पेट्रोलियम तेल और क्रूड / प्राइमरी और हर प्रकार के बेस उत्पाद और सभी फॉर्मुलेशनों का निर्यात, मांस और मांस उत्पादों आदि का निर्यात, सेवाओं का निर्यात, हीरे, सोने, चांदी, प्लैटिनम और अन्य कीमती धातुओं का किसी भी रूप में निर्यात, अयस्क और भस्म, अनाज और आईटीसी (एचएस) में निर्यात नीति की अनुसूची-2 में निर्यात के लिए प्रतिबंधित तथा जब तक कि परिशिष्ट 3बी में विशेष रूप से अधिसूचित न हों, एमईआईएस के अंतर्गत रिवार्ड के लिए पात्र नहीं हैं।

ड्यूटी क्रेडिट स्क्रिप के अंतर्गत डेबिट के जरिए भुगतान किया गया अतिरिक्त सीमा शुल्क / उत्पाद शुल्क / सेवा कर राजस्व विभाग के नियमों अथवा अधिसूचनाओं के अनुसार सेनवैट क्रेडिट अथवा ड्यूटी ड्रॉबैक के रूप में समायोजित किया जाएगा। नकद भुगतान किया गया अथवा ड्यूटी क्रेडिट स्क्रिप के अंतर्गत डेबिट किया गया आधारभूत सीमा शुल्क राजस्व विभाग के नियमों अथवा अधिसूचनाओं के अनुसार ड्यूटी ड्रॉबैक के रूप में समायोजित किया जाएगा।

आवेदक के नाम वाले शिपिंग बिल को आवेदक के निर्यात निष्पादन / टर्नओवर के रूप में केवल तभी गिनना चाहिए, जब विदेश से निर्यात आय आवेदक के बैंक खाते में आई हो और ई-बीआरसी / एफआईआरसी से इसका प्रमाण मिले। तथापि, एमईआईएस रिवार्ड सहयोगी विनिर्माता (कंपनी/फर्म जिसे विदेशी मुद्रा सीधे विदेश से प्राप्त हुई हो के डिस्क्लेमर के साथ) अथवा कंपनी / फर्म जिसे विदेशी मुद्रा सीधे विदेश से प्राप्त हुई हो, द्वारा क्लेम किया जा सकता है।

निर्यात दायित्व डिफाल्ट होने पर ड्यूटी क्रेडिट स्क्रिप का इस्तेमाल ड्यूटी एक्जंप्शन स्कीम या ईपीसीजी स्कीम के लिए जारी अथॉराइजेशन हेतु सीमा शुल्क के भुगतान के लिए किया जा सकता है। इस प्रकार का उपयोग उन वस्तुओं के संबंध में किया जा सकेगा, जिनका आयात संबंधित रिवार्ड योजना के अंतर्गत किया जा सकता है। ड्यूटी क्रेडिट स्क्रिप का उपयोग एफटीपी के अंतर्गत कम्पोजिशन फीस, आवेदन फीस, यदि कोई है और निर्यात दायित्व में कम पड़ रहे मूल्य के भुगतान के लिए भी किया जा सकता है।

ड्यूटी क्रेडिट स्क्रिप और एमईआईएस के अंतर्गत देश में ही आयातित / खरीदे गए माल को एक स्थान से दूसरे स्थान पर निःशुल्क ले जाया जा सकता है।

ड्यूटी ड्रॉबैक क्या है? यह योजना काम कैसे करती है?

ड्यूटी ड्रॉबैक होती है शुल्क वापसी। दरअसल होता यह है कि किसी भी आयातित माल पर और निर्यात माल के विनिर्माण में इस्तेमाल की गई सेवाओं पर एक शुल्क लगता है। इसी शुल्क की वापसी या इसमें छूट को ड्यूटी ड्रॉबैक के नाम से जाना जाता है। इसका प्रावधान सीमाशुल्क अधिनियम 1962 तथा सीमाशुल्क और केंद्रीय उत्पाद शुल्क एवं सेवाकर ड्रॉबैक नियम, 1995 (ड्रॉबैक नियम, 1995) में किया गया है। शुल्क वापसी की दरें दो तरह की होती हैः (i) सभी उद्योगों की दरें, जिन्हें ऑल इंडस्ट्रीज रेट - एआईआर कहते हैं और (ii) ब्रांड की दरें, जिसे ब्रांड रेट कहा जाता है।

एआईआर को सरकार द्वारा सामान्यतः हर साल शुल्क वापसी अनुसूची के रूप में अधिसूचित किया जाता है। इसका निर्धारण निर्यात उत्पादों की औसत मात्रा और उन पर लगने वाले शुल्कों (उत्पाद और सीमा शुल्क दोनों) तथा इनपुट सेवाओं पर लगने वाले सेवा कर के आधार पर किया जाता है। एआईआर औसत दरें होती हैं, जिनका निर्धारण औसत कर भार, स्वदेशी और आयातित दोनों तरह के उत्पादों की विभिन्न सामग्रियों के खरीद मूल्य, लागू शुल्क दरों, खपत अनुपात और निर्यात उत्पादों के एफओबी मूल्यों के आधार पर किया जाता है। एआईआर निर्यात उत्पाद के एफओबी मूल्य के एक निश्चित प्रतिशत या विशिष्ट दरों के रूप में निर्धारित की जा सकती हैं। शुल्क वापसी की ऊपरी सीमा इसके दुरुपयोग से बचने के लिए निर्धारित की जाती है। ड्रॉबैक नियम, 1995 के नियम 3 के अंतर्गत शुल्क वापसी की अधिकतम राशि निर्यात उत्पाद के बाजार मूल्य की एक तिहाई हो सकती है।

शुल्क वापसी की ब्रांड दर में निर्यातक को निर्यात उत्पाद के वास्तविक कर भार की एक प्रकार से क्षतिपूर्ति कर दी जाती है, जो दस्तावेजों के सत्यापन और उत्पाद के विनिर्माण में इस्तेमाल होने वाली सामग्री की वास्तविक मात्रा के प्रयोग के प्रमाण तथा उसके बाद चुकाए गए शुल्कों पर आधारित होती है। ब्रांड दर ड्रॉबैक नियम, 1995 के नियम 6 और 7 के अंतर्गत निर्धारित की जाती है, जहां निर्यात उत्पाद की शुल्क वापसी के लिए एआईआर नहीं होती या एआईआर उस उत्पाद के विनिर्माण में प्रयुक्त सामग्री पर चुकाए गए शुल्कों के 4/5 से कम होती है।

ब्रांड दर विनिर्माण इकाई के क्षेत्र के केंद्रीय उत्पाद शुल्क आयुक्तालय द्वारा निर्धारित की जाती है। ब्रांड दर निर्धारण उत्पादों के विनिर्माण में लगी सामग्री के विवरण और उन पर चुकाए गए शुल्कों का विवरण पूर्व निर्धारित समयसीमा में प्रदान कर किया जाता है। शुल्कों की जांच के बाद, उस क्षेत्र के केंद्रीय उत्पाद शुल्क आयुक्तालय द्वारा आवेदन करने वाले निर्यातक को ब्रांड दर पत्र जारी किया जाता है, जिसमें शिपिंग बिल के एवज में उसे की जाने वाली शुल्क वापसी की राशि सूचित की जाती है। आयुक्तालय द्वारा जारी किए गए ब्रांड दर पत्र की प्रति संबंधित सीमा शुल्क प्राधिकारी को पहुंचाई जाती है, ताकि ब्रांड दर पत्र के अनुसार निर्यातक को शुल्क वापसी की जा सके।

कस्टम्स ईडीआई स्थानों पर शुल्क वापसी के दावों की जांच, मंजूरी और भुगतान ईडीआई सिस्टम की सहायता से की जाती है, जहां से अन्य शर्तें पूरी होने और एयरलाइंस / शिपिंग लाइंस द्वारा ईजीएम सही फाइल किए जाने के बाद शुल्क वापसी की देय राशि निर्यातक के बैंक खाते में सीधे प्रेषित कर दी जाती है।एआईआर अथवा ब्रांड दर निर्यात के समय शिपिंग बिल तथा शिपिंग बिल / निर्यात बिल के निर्धारित प्रारूप में आवश्यक जानकारी प्रदान कर क्लेम की जा सकती है। यदि इलेक्ट्रॉनिक शिपिंग बिल है तो इसे ही शुल्क वापसी के लिए क्लेम मान लिया जाता है। यदि मैनुअल है तो शिपिंग बिल की तीसरी प्रति को शुल्क वापसी के लिए क्लेम माना जाता है। क्लेम ड्रॉबैक नियम 1995 में निर्धारित दस्तावेजों के साथ दिए जाने पर ही पूरा होता है।

एआईआर अथवा ब्रांड दर निर्यात के समय शिपिंग बिल तथा शिपिंग बिल / निर्यात बिल के निर्धारित प्रारूप में आवश्यक जानकारी प्रदान कर क्लेम की जा सकती है। यदि इलेक्ट्रॉनिक शिपिंग बिल है तो इसे ही शुल्क वापसी के लिए क्लेम मान लिया जाता है। यदि मैनुअल है तो शिपिंग बिल की तीसरी प्रति को शुल्क वापसी के लिए क्लेम माना जाता है। क्लेम ड्रॉबैक नियम 1995 में निर्धारित दस्तावेजों के साथ दिए जाने पर ही पूरा होता है।

हालांकि निर्यात आय का पूर्व प्रत्यावर्तन शुल्क वापसी (ड्यूटी ड्रॉबैक) पूर्वापेक्षा नहीं है, तथापि कानूनी प्रावधानों के अनुसार यदि बिक्री लाभ आरबीआई द्वारा निर्धारित समयसीमा के भीतर प्राप्त नहीं हुआ है तो शुल्क वापसी ड्रॉबैक नियम 1995 में निर्दिष्ट अनुसार की जाएगी।

एडवांस अथॉराइजेशन स्कीम क्या है? यह कैसे काम करती है?

एडवांस अथॉराइजेशन स्कीम यानी अग्रिम प्राधिकार योजना। इसके जरिए निर्यात योग्य उत्पादों को तैयार करने में इस्तेमाल होने वाली सामग्री का ड्यूटी फ्री आयात किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, इस योजना के अंतर्गत विनिर्माण प्रक्रिया में लगने वाले ईंधन, तेल और उत्प्रेरकों का भी ड्यूटी फ्री आयात संभव है। निर्यात उत्पाद के साथ निर्यात की जाने वाली अनिवार्य सामग्री का भी इस योजना के अंतर्गत शुल्क रहित आयात किया जा सकता है। कुछ उत्पादों को छोड़कर इस योजना के अंतर्गत न्यूनतम वेल्यू एडिशन 15% है।

विनिर्माताओं और सहायक विनिर्माताओं से जुड़े व्यापारी निर्यातकों को अग्रिम प्राधिकार (एडवांस अथॉराइजेशन) प्रदान किया जा सकता है। डीम्ड एक्सपोर्ट से जुड़े मुख्य कॉन्ट्रैक्टर और सब-कॉन्ट्रैक्टरों को भी अग्रिम प्राधिकार मिल सकता है।

वस्तुगत निर्यातों या डीम्ड एक्सपोर्ट के लिए अग्रिम प्राधिकार विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) के क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा जारी किए जाते हैं। ये डीजीएफटी द्वारा अधिसूचित स्टैंडर्ड इनपुट आउटपुट नॉर्म्स (एसआईओन) के रूप में जारी किए जाते हैं। जहां डीजीएफटी द्वारा किसी वस्तु के लिए एसआईओन को अधिसूचित नहीं किया गया है या अधिसूचित किया गया है, लेकिन निर्यातक अलग इनपुट चाहता है या इनपुट की अलग मात्रा चाहता है तो वह अपनी स्वयं की घोषणा और विनिर्माण प्रक्रिया आदि की आवश्यक जानकारी प्रदान कर प्राधिकार के लिए आवेदन कर सकता है, ताकि डीजीएफटी की नॉर्म्स समिति इस संबंध में मानदंड बना सके।

कस्टम्स को निर्यात दायित्व पूरा करने की वचनबद्धता संबंधी बॉन्ड प्रस्तुत करने के एवज में ड्यूटी फ्री आयात की अनुमति है। कुछ निर्यातकों के मामलों में बॉन्ड के साथ गारंटी का होना भी जरूरी है। निर्यात दायित्व पूरा करने के लिए सामान्य समयावधि 18 महीने है, जिसे निर्धारित कंपोजिशन फीस के भुगतान पर बढ़ाकर 30 माह तक किया जा सकता है।

ड्यूटी फ्री सामग्री का उपयोग प्राधिकृत प्रयोक्ता द्वारा ही किया जा सकता है। अर्थात ड्यूटी फ्री सामग्री प्राधिकार में विनिर्माता अथवा सहयोगी विनिर्माता की फैक्ट्री में ही इस्तेमाल होनी चाहिए। उस सामग्री को बेचा या किसी और को हस्तांतरित नहीं किया जा सकता है, यहां तक कि निर्यात दायित्व पूरा करने के बाद भी नहीं। तथापि, ड्यूटी फ्री सामग्री से तैयार उत्पादों को निर्यात दायित्व पूरा करने के बाद घरेलू बाजारों में बेचा जा सकता है। अग्रिम प्राधिकार धारक को ड्यूटी फ्री आयातित सामग्री का अलग से हिसाब रखना चाहिए और निर्यात उत्पाद के विनिर्माण में इस सामग्री के समुचित उपयोग तथा खपत का विवरण प्रस्तुत करना चाहिए।

एक निर्यातक अग्रिम प्राधिकार के लिए आवेदन करने के बाद अपना निर्यात दायित्व पूरा करना शुरू कर सकता है और कुछ ऐसी चुनिंदा वस्तुओं को छोड़कर, जिन पर पूर्व-आयात की शर्त लागू है, अपनी ड्यूटी फ्री सामग्री का आयात बाद में कर सकता है। ऐसे में निर्यातक को आयात के समय कस्टम्स को कोई बॉन्ड प्रस्तुत करने की जरूरत नहीं होगी।

अग्रिम प्राधिकार धारक यदि सामग्री आयात करने के बजाय इसे अपने घरेलू विनिर्माता से खरीदता है तो वह प्रत्यक्ष आयात संबंधी अपने प्राधिकार को रद्द करा एडवांस रिलीज ऑर्डर (एआरओ) अथवा रद्दीकरण पत्र (आईएल) प्राप्त कर सकता है अथवा स्थानीय आपूर्तिकर्ता के पक्ष में बैक-टू-बैक साख पत्र (एलसी) प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार के एआरओ अथवा आईएल के एवज में की गई आपूर्ति को डीम्ड एक्सपोर्ट माना जाएगा।

निर्यात दायित्व पूरा करने के लिए किया गया निर्यात डीईईसी शिपिंग बिलों के अंतर्गत किया जाना चाहिए। निर्यात दायित्व पूरा किए जाने के बाद निर्यातक को इसके प्रमाण के रूप में शिपिंग बिलों की ईपी कॉपी (यदि डीम्ड एक्सपोर्ट है तो इनवॉइस) और ई-बीआरसी निर्यात के प्रमाण के रूप में प्राधिकार जारीकर्ता प्राधिकारियों और कस्टम्स के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी तथा निर्यात दायित्व डिस्चार्ज प्रमाण पत्र प्राप्त करना होगा।

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